Thursday, June 13, 2024
नए साथी करेंगे फेवर या दिखाएंगे तेवर
"एनडीए सरकार बनाने में फेवर करने वाले दलों के तेवर स्पीकर के चुनाव तक संयमित रहेगा,इसमें संदेह है। तोल- मोल की सरकार कितने घर चलेगी न मोदी जानते हैं ,न ही नीतिश और न ही चन्द्रबाबू नायडू। मोहन भागवत से लेकर पूरा विपक्ष इंतजार कर रहा है अपने टाइम का।"
0 रमेश कुमार ‘रिपु’
सरकार वही।चेहरे वही।मोहरे वही।पासे भी वही हैं। सिर्फ कुछ साथी नए हैं। अब बीजेपी की नहीं, एनडीए की सरकार है। सरकार का नाम बदला है। मजबूरी है। विवशता है। क्यों कि सबको साथ लेकर चलना है। सरकार बनाने में साथ देने वाले साथियों के दम पर मोदी सियासी पहाड़ चढ़ने का मन बनाए हैं। सौ दिन के सियासी एजेंडे का खाका भी खींच लिये हैं। सरकार चल पड़ी है। प्रधान मंत्री मोदी ने इसका संकेत दे दिया है। किसानों को सौगात दी। पीएम किसान सम्मान निधि की 17वीं किस्त जारी की।9.3 करोड़ किसानों को लाभ होगा और करीब बीस हजार करोड़ रुपए बांटे जाएंगे। आवास योजना के तहत 3 करोड़ ग्रामीण और शहरी घरों के निर्माण किये जाएंगे।अभी तक दस वर्षो में कुल 4.21 करोड़ घर बनाये गए हैं। चुनाव में बेरोजगारी मुद्दा छाया रहा। इसलिए रोजगार पर खास ध्यान रहेगा।
बुनियादी सवाल -
मगर राजनीति के कुछ बुनियादी सवाल हैं। जो 18 जून को सांसदों के शपथ के बाद 20 जून को होने वाले स्पीकर चुनाव में विपक्ष के साथ देश की नज़र है। क्यों कि प्रधान मंत्री मोदी इस बार नए अवतार में हैं। होना भी चाहिए। नए सोच के साथ खड़े हैं । उन्हें सबका साथ चाहिए। और सबका विकास करना है। मोदी के लिए 140 करोड़ लोग परमात्मा का स्वरूप हो सकते हैं। लेकिन, जिन्हें लेकर सियासी पहाड़ चढ़ना है। दूर तक चलना है। क्या वो बीस जून को चलते-चलते ठहर कर नहीं कहेंगे, कि स्पीकर तो हमारा होगा? आप ने बीजेपी सांसदों को गृह मंत्रालाय,वित्त मंत्रालय,रक्षा मंत्रालय,कृषि विभाग,परिवहन मंत्रालय दे दिया। कोई बात नहीं। सभी बड़े और सम्मानीय विभाग बांट लिये। फिर भी हम कुछ नहीं बोले। लेकिन स्पीकर भी आप की ही पार्टी का हो, ऐसा नहीं चलेगा। सियासत की ढाई चाल सिर्फ आप ही नहीं,हम भी चलना जानते हैं। राजनीतिक सीन में इंडिया गठबंधन है ही साथ, अब एनडीए के घटक दलों में नीतीश और चन्द्रबाबू नायडू भी है। इन्हें एनडीए सरकार की फिल्म में मेहमान कलाकार नहीं कह सकते। असली खेला होना बकाया है।
राजनीति में कुछ सवाल ऐसे हैं,जिन्हें नज़र अंदाज नहीं किया जा सकता। उनमें से एक सवाल यह है,कि बीस जून को यदि टीडीपी नेता चन्द्र बाबू नायडू अड़ गए कि स्पीकर हमारी पार्टी से होगा, नीतीश भी यही चाहते हैं। डीटीपी ने स्पीकर का अपना उम्मीदवार उतार दिया, चुनाव करा लेते हैं। ऐसे में टीडीपी के पीछे पूरा इंडिया गठबंधन खड़ा दिखे तो कोई आश्चर्य नहीं। जदयू भी साथ हो तो हैरानी नहीं। ऐसे में बीजेपी का स्पीकर उम्मीदवार चुनाव हार गया तो पूरी एनडीए सरकार एक पल में ताश के पत्ते के महल की तरह ढह जाएगी। चन्द्र बाबू नायडू और नीतिश कुमार दोनों मोदी और अमितशाह के खेल से वाकिफ हैं। दोनों की बिसात को भी जानते हैं। यदि बीजेपी का स्पीकर हुआ तो बीजेपी को 240 से 272 होने में कोई ताकत नहीं है, जो रोक सके। सारा खेल छह माह के भीतर हो जाएगा। उनके पास हाथ मलने के सिवा कुछ नहीं बचेगा। सवाल यह भी है,कि चन्द्र बाबू नायडू क्या आन्ध्र प्रदेश को विशेष दर्जा दिये जाने की शर्त पर स्पीकर पद से पीछे हट जाएंगे। और हट गए तो इसकी क्या गारंटी है,कि उनकी पार्टी के सांसद टूट कर बीजेपी में शामिल नहीं होंगे। मोदी की गारंटी जनता को मिले या न मिले, मगर बीजेपी को बहुमत मिलने की पूरी संभावना है।
पार्टी टूटने का भय -
जब किसी पार्टी की सरकार बनती है,तो वैसे भी छोटे- मोटे दल सरकार के साथ बगैर न्यौता दिये मिल जाते हैं। छोटे-छोटे राज्यों के गैर बीजेपी के सांसद मिल ही जाएंगे। वो बाहर से सरकार को समर्थन देने में पीछे नहीं हटेंगे।वो चाहे केन्द्र में एनडीए की सरकार हो या फिर इंडिया गठबंधन की। बीजेपी का स्पीकर होने पर सभी को अपनी पार्टी टूटने का डर है। और कोई ऐसे वक्त का इंतजार नहीं करना चाहता।
सभी को वक्त का इंतजार -
मंत्रिमंडल के गठन के बाद विभाग बंटवारे को लेकर नाराजगी एनडीए में देखी जा रही है। जाहिर है,बात खुश करने की है। अखिलेश यादव वैसे कह ही चुके हैं,कि यदि किसी को खुश करने से सरकार बनती है,तो हमें खुश करने में कोई दिक्कत नहीं है। जिसे जो विभाग चाहिए ले ले। शरद पवार वक्त का इंतजार कर रहे हैं। वो एनडीए सरकर के गिरने की राह देख रहे हैं। सभी को वक़्त का इंतजार है। एक नाथ शिंदे की पार्टी शिवसेना के पास सात सांसद है। जिसे प्रधान मंत्री मोदी असली शिवसेना कहते हैं। लेकिन उनकी पार्टी से केवल एक व्यक्ति को मंत्री बनाया गया। जबकि जतिन राम माझी अपनी पार्टी के अकेले सांसद हैं,उन्हें कैबिनेट मंत्री बनाया गया है। प्रफुल्ल पटेल पिछली बार कैबिनेट मंत्री थे,इस बार उन्हें राज्य मंत्री बनाए जाने का आफर था। अजीत पवार ने कहा,सरकार चलाने का अनुभव हमारे पास है।हमें फुसलाने की कोशिश न करें। ऐसे नहीं चलेगा। लल्लन सिंह को पशुपालन विभाग मिला है। जबकि इन्हें कोई बड़ा विभाग मिलने की उम्मीद थी। जाहिर सी बात है, कि इनका सियासी अपमान किया गया है। उद्धव ठाकरे कह रहे हैं, पी.एम. के रूप में मोदी पसंद नहीं हैं। नीतिन गडकरी हों तो विचार करेंगे। यानी गुजरात मानुस और मराठा मानुस में टकराहट वाली बात है। दिल्ली अपने अनुरूप यू.पी. में राजनीति करना चाहती है। योगी को हटाना चाहती है।योगी राजनाथ,नीतिन गडकरी,और जेपी नड्डा से भी मिले।25 टिकट अमित शाह ने दिये और सीट नहीं आई तो योगी आदित्यनाथ का इसमें क्या दोष? जबकि महाराष्ट्र बीजेपी के हाथ से निकल गया है। बीजेपी सरकार के अल्पमत होने पर संघ प्रमुख मोहन भागवत ने मोदी पर निशाना साधा। जिस विचार धारा के पालने में बीजेपी पली, वही अब संघ को आंखें दिखाए,ऐसा नहीं चलेगा। मोहन भागवत ने दो टुक कह दिया। मणिपुर में पिछले कई माह से अशांति का वातावरण है। मगर उसे हल करने कोशिश नहीं की गयी।इसे प्राथमिकता में रखते हुए शांति बहाली का प्रयास किया जाना चाहिए। इस मामले में विपक्ष संसद में भी पूछता रहा,कि प्रधान मंत्री मणिपुर पर खामोश क्यों हैं? एक वर्ष से भी अधिक समय बीत गया, मगर मणिपुर में हिंसा कायम है। कुकी और मैतेई समुदाय के बीच संघर्ष चल रहा है।
अपनी -अपनी चाहत -
नीतीश चाहते हैं जब महाराष्ट्र,हरियाणा और झारखंड के चुनाव की घोंषणा हो तो बिहार का भी। वो जानते हैं,अब वोट बीजेपी में स्थानांतरित नहीं हो रहा है बिहार में। पिछले विधान सभा में भी यही हुआ था। विधान सभा चुनाव हो जाने पर वो स्वतंत्र हो जाएंगे। जबकि बिहार में चुनाव अगले साल होना है। नीतीश के मन का नहीं होने पर नाराजगी का ठिकरा भी फूटेगा। वैसे जेडीयू अपनी नाराजगी का संकेत देना शुरू कर दिया है। जेडीयू के प्रवक्ता के. सी. त्यागी ने अग्निवीर और यूनिफार्म सिविल कोड पर सवाल उठा दिए हैं। त्यागी ने साफ- साफ कहा,कि अग्निवीर योजना को लेकर लोगों में नाराजगी है।हमारी पार्टी इस पर विस्तार से चर्चा चाहती है। मुस्लिम आरक्षण खत्म करना,वन नेशन वन इलेक्शन,प्लेसेज ऑफ वर्शिप एक्ट में बदलाव,वक्फ बोर्ड खत्म करना,सीएए का कम्पलीट इम्प्लिमेंटेशन और यूनिफाॅर्म सिविल कोड पर जेडीयू चर्चा चाहती है। टीडीपी भी इन सभी मुद्दों पर बीजेपी के पक्ष में नहीं है। खासकर मुस्लिम आरक्षण,महिला आरक्षण,वक्फ बोर्ड को खत्म करना,प्लेसेज ऑफ वर्शिप एक्ट को खत्म करना। जाहिर सी बात है कि एनडीए सरकार बनाने में फेवर करने वाले दलों के तेवर स्पीकर के चुनाव तक संयमित रहेगा,इसमें संदेह है। तोल- मोल की सरकार कितने घर चलेगी न मोदी जानते हैं ,न ही नीतीश और न ही चन्द्रबाबू नायडू। मोहन भागवत से लेकर पूरा विपक्ष इंतजार कर रहा है, अपने टाइम का।
Wednesday, June 12, 2024
अबकी बार खत्म हुआ मोदी का एकाधिकार
"तीसरी
बार मोदी सरकार मजबूत या फिर मजबूर,यह सवाल संसद में विश्वास मत हासिल
करने तक कायम रहेगा। साथ ही मोदी की अग्नि परीक्षा भी है, गठबंधन की सरकार
चलाना। क्यों कि एनडीए के घटक दलों की विचार धारा बीजेपी से मेल नहीं खाती
है। उन्हें कड़े फैसले लेने में भी जदयू और टीडीपी से सहमति लेनी
पड़ेगी।क्यों कि अबकी बार मोदी का एकाधिकार खत्म हो गया है।"
- रमेश कुमार 'रिपु'
अबकी
सरकार में सियासी दलों के एजेंडे अपने-अपने हैं। सब अलग भी हैं। जुड़े भी
हैं। दबंग चन्द्रबाबू नायडू मोदी के साथ हैं भी,नहीं भी हैं। नितिश ने मोदी
का पैर छूकर सम्मान दिया मगर, कब पलट जाएंगे, इसका एहसास मोदी की मंडली को
है। सभी छुट्टे हैं। पाला बदलने में एक मिनट की भी देरी नहीं करेंगे।लेकिन
सुविधानुसार।सहूलियत के हिसाब से सांप सीढ़ी वाली राजनीति में अपने पासे
फेंकेंगे।नितिश और चन्द्रबाबू नायडू कब तक साथ रहेंगे, यह लोकतंत्र की
सियासत का वक़्त भी नहीं जानता। कल तक मोदी बीजेपी के प्रधानमंत्री थे। अब
एनडीए के प्रधान मंत्री रहेंगे।दरअसल सत्ता की थैली में चिल्हर ज्यादा हो
गए हैं। आगे भी रहेंगे। इंडिया गठबंधन की थैली हो या फिर एनडीए की थैली।
दोनों एक समान है।राष्ट्रीय रुतबे का अवसान हो रहा है तेजी से। दोनों हताश
हैं। क्या कांग्रेस और क्या भाजपा। लेकिन सबकी अपनी- अपनी रणनीतियां हैं।
इस बार विपक्ष पिछली दफ़ा से कहीं अधिक मजबूत है। वहीं मोदी का अबकी बार
एकाधिकार भी खत्म हो गया। मजबूर हैं और रहेंगे । क्यों कि पेंच बहुत है।
पैतरे बाजी भी अनगिनत। कहने को नौ जून को प्रधान मंत्री पद के शपथ तक और
मंत्रिमंडल के गठन तक सभी जुड़े हैं।मगर अलग भी हैं।
शर्तो
की राजनीति - कुछेक ऐसे सवाल है,जिनसे आज नहीं, तो कल रूबरू होना पड़ेगा।
मोदी को। पूरे देश को। पूरे विपक्ष को। शर्तो की राजनीति या फिर कहें शर्तो
की बुनियाद पर टिकी एनडीए की सरकार। एनडीए के सांसदों की बैठक में मोदी ने
कहा, एनडीए की सरकार बनने जा रही है। इसके पहले 2014 और 2019 में बीजेपी
की सरकार कहा था। अटल जी की सरकर की तरह मोदी की सरकार के दिन भी आ सकते
हैं। कई दलों की बग्गी वाली सरकार, एक ही दिशा में कब तक चलेगी, मोदी भी
नहीं जानते। क्यों कि मोदी कभी ऐसी राजनीति किये नहीं। गुजरात में
मुख्यमंत्री थे,तब भी वो एकाधिकार की राजनीति किये हैं। पिछले दस साल में
उन्होंने ऐसा कोई दल नहीं,जिसे ठगा नहीं। और कोई ऐसा दल नहीं,जिसे खत्म
करने में कोई कसर नहीं छोड़ी।गोवा,महाराष्ट्र,उत्तराखंड और मध्यप्रदेश को
कोई भूला नहीं है। गिरते शेयर बाजार और गिरते रुपए की तरह इस चुनाव में
मोदी की साख गिरी है। पिछली बार छह लाख वोट से जीतने वाले मोदी इस बार डेढ़
लाख वोट पर सिमट गए। शिवराज सिंह चौहान को मध्यप्रदेश का मुख्यमंत्री बनाने
की बजाए किनारे कर दिया था, वो आठ लाख बीस हजार वोट से जीते। जाहिर सी बात
है, भाजपा के अंदर इस चुनाव ने कई खेमे बनने की रेखा खींच दी है। आज नहीं
तो कल दिखेगी।
मनमाफिक
मंत्री पद चाहिए - नरेन्द्र मोदी के प्रधान मंत्री के पद की शपथ लेने से
पहले ही सियासी उथल पुथल की झलक दिखने लगी है। नितिश और चन्द्रबाबू नायडू
दोनों को अपने-अपने प्रदेश के लिए विशेष दर्जा चाहिए। उनकी अपनी सियासी
शर्त भी है। चन्द्रबाबू नायडू को लोकसभा का अध्यक्ष पद चाहिए। वो जानते
हैं, मोदी और अमितशाह का भरोसा नहीं। उनके सांसदों को कभी भी तोड़ सकते हैं।
बीजेपी का स्पीकर होगा तो मोदी की ही सुनेंगे।जगन रेड्डी के चार सांसद
बीजेपी की ओर जा रहे हैं, अभी से हल्ला है. नायडू को परिवहन मंत्रालय
चाहिए। गृहमंत्रालय चाहिए। ताकि पुलिस और सीबीआई उनके साथ रहे। सभावना है
कि नागरिक उड्डयन,इलेक्ट्रानिक,आईटी,शहरी विकास और स्टील मंत्रालय मिल सकता
है। नितिश को रेल मंत्रालय और वित्त विभाग चाहिए। ताकि ईडी उनके पास रहें।
पंचायती राज ग्रामीण विकास,कृषि जैसे मंत्रालय मिल सकता है। एनडीए के घटक
दलों में नायडू और नितिश इस बार मोदी का एकाधिकार खत्म करने वाले विभाग
चाहते हैं। इनकी पार्टी के सांसदों को कौन सा मंत्री पद मिलता है,दो तीन
दिन बाद पता चलेगा। वैसे मोदी नहीं चाहेंगे कि रक्षा,वित्त,गृह और विदेश
मंत्रालय एनडीए के दलों के पास हो। बीजेपी के प्रवक्ताओं की ओर से कहा जा
रहा है,कि गठबंधन का प्रेशर बीजेपी नहीं लेगी। किसी सहयोगी की अतार्किक
अनावश्यक मांग के आगे नहीं झुकेगी। गठबंधन के नियमों और गठबंधन धर्म के तहत
काम होगा।
कई मोर्चे पर
चिंतन - देखा जाए तो सरकार नितिश और नायडू के पर्स में हैं। यानी इस बार
भाजपा लस्त पस्त है। लकवाग्रस्त है। नेता हैं,पर निष्प्रभ। कम सीटें आने से
पार्टी के नेता हताश हैं। एक साथ कई मोर्चे पर चिंतन चल रहा है। मोदी से
भी अधिक वोटों से जीत कर आने वाले नेताओं की भरभार है। कहने को तो सामूहिक
नेतृत्व। पर लचर,लाचार। संघ की निगाहें टिकी है मंत्रिमंडल के गठन पर। इस
बार मोदी संघ की कितनी सुनते हैं,सवाल यह भी है। नड्डा बोल ही चुके
हैं,बीजेपी बड़ी पार्टी हो गयी है,उसे संघ की जरूरत नहीं है। यदि मोहन भागवत
ने संघ वाले सांसदों से कह दिया,कि वो मोदी को अपना नेता न चुनें तो
बीजेपी के अंदर की सियासत बदल जाएगी। इस बार पूरी पार्टी मोदी की जेब में
नहीं है। मोदी के मंत्रिमंडल में नितिन गडकरी को स्थान नहीं मिलने पर चाल
चरित्र और चेहरा की बात करने वाली पार्टी की तस्वीर भी बदल सकती है। भाजपा
मोदी की जागीर है या फिर संघ की। यह सवाल देर सबेर धूल की तरह उढ़ सकता है।
बीजेपी
के 14 सहयोगियों के पास 53 सीटें हैं। पी.एम.आवास में हुई बैठक में
इन्होंने लिखकर दिया है कि हमारा समर्थन मोदी के साथ है। सबके मन में
मंत्री बनने की चाह है। छोटे- छोटे राज्यों के दलों को भी जोड़ने में बीजेपी
लगी है। गठबंधन धर्म सरकार चलाने में रोड़ा बन सकते हैं। अभी से सियासी
कयास लगाए जाने लगे हैं। क्यों कि कुछ ऐसे मुद्दे हैं, जिन पर मोदी अपने
कदम पीछे नहीं किये तो सरकार गिर जाएगी। उन्हें भी समझौता करना पड़ सकता है।
मसलन - एक देश एक चुनाव। इसके खिलाफ है टीडीपी, जबकि जदूय इसके समर्थन में
है। विपक्ष भी नहीं चाहता एक देश एक चुनाव। परिसीमन के भी विरोध में है
टीडीपी। बीजेपी ने 2029 तक महिला आरक्षण का वादा किया है। यह परिसीमन पर ही
लागू होगा। इसी तरह युनिफार्म सिविल कोड को बीजेपी पूरे देश में लागू करना
चाहती है। उत्तराखंड में लागू हो चुका है। मोदी इसे राष्ट्रीय प्राथमिकता
से अलग कर सकते हैं। राम मंदिर बनने का लाभ बीजेपी को देश में क्या यूपी
में भी नहीं मिला। अयोध्या,चित्रकूट,सीतापुर,बस्ती ,प्रयागराज,सुल्तानपुर,रामटेक, कोप्पल,रामेश्वरम,नासिक,
में बीजेपी हार गयी है। इसलिए काशी मथुरा का दावा अब बीजेपी नहीं करेगी।
टीडीपी ने सन्2018 में आंध्र को विशेष दर्जा नहीं दिये जाने पर बीजेपी से
नाता तोड़ लिया था। इसी तरह मुस्लिमों को चार फीसदी आरक्षण देने के मुद्दे
पर दोनों पार्टियों में टकराव हो सकता है। जदयू सार्वजननिक क्षेत्र की
कंपनियों में विनिवेश के खिलाफ है। बीजेपी को अपने कदम पीछे करना पड़ सकता
है।अग्निवीर मामले में बीजेपी को अपना फैसला बदलना पड़ सकता है। जदयू नेता
के.सी.त्यागी ने कह दिया है,बनने पर सरकार इस पर विचार करे।
तीसरा
कार्यकाल चुनौती भरा - मोदी का तीसरा कार्यकाल चुनौती भरा है। क्यो कि
एनडीए घटक दलों को मोदी खुश किये बगैर कोई भी फैसला नहीं ले पाएंगे। मोदी
सरकार पर आने वाले तीन महीने चुनौती भरे होंगे। इसलिए कि इसी साल
महाराष्ट्र,हरियाणा और झारखंड में चुनाव है। हरियाणा में 2019 में बीजेपी
की दस सीटें थी। इस बार घटकर पांच सीट हो गयी है। कांग्रेस को पांच सीट
मिली है। जाहिर है हरियाणा जीतना मुश्किल हो सकता है। झारखंड में झामुमो और
कांग्रेस की सरकार है। वहां भी दलित आरक्षण मुद्दा विधान सभा तक कायम रहा
तो बीजेपी के लिए नुकसान हो सकता है। महाराष्ट्र में कांग्रेस सबसे बड़ी
पार्टी के रूप में उभरी है। उसे दस सीट मिली है। जाहिर है कि मोदी के लिए
सरकार चलाना अग्नि परीक्षा से कम नहीं है। अभी तो बवाल इसी बात के लिए है
कि कम सांसद वाले नेताओं को मंच पर बिठाया गया और ज्यादा सांसद वालों को
दर्शक दिर्घा में। यू.पी. के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी को लेकर अमितशाह
भारी नाराज हैं। जबकि मोदी ने उनकी पीठ थपथपा दी है। यानी मोदी समझ रहे
हैं, कि नेहरू के तीन बार प्रधान मंत्री बनने के रिकार्ड की बराबरी करना
है,तो सबको खुश करके चलना पड़ेगा।
Thursday, June 6, 2024
अबकी बार बैसाखियों पर सरकार
केन्द्र
में अबकी बार मोदी या फिर बीजेपी की नहीं बल्कि, एनडीए की सरकार होगी।
लेकिन बैसाखियों के सहारे चलने वाली सरकार के प्रधानमंत्री नरेन्द मोदी
पहले की तरह ताकतवर नहीं रहेंगे। नितिश के पास बहुत विकल्प हैं।
चंन्द्रबाबू नायडू और नितिश की विचारधारा मोदी से मेल नहीं खाती। इसलिए
हमेशा संशय बना रहेगा सरकार के गिरने का।
- रमेश कुमार ‘रिपु’
अबकी
बार चार सौ पार वाला नारा चार जून की शाम को बूढ़ा हो गया। इसी के साथ मोदी
की राजनीति के चेहरे पर झुर्रियां आ गयी। और उनकी सत्ताई सियासत बैसाखी पर
आ गयी। अपने मन की बात कहने वाले को अब दूसरे के मन की बात सुननी पड़ेगी।
मोदी प्रधान मंत्री बनेंगे या फिर संघ किसी और को आगे करेगा। यह सवाल अभी
दो -चार दिन सियासी गलियारे में दौड़ते रहंगे। वैसे मोदी ने राष्ट्रपति
द्रोपदी मुर्म को इस्तीफा दे दिया है।साथ ही मंत्रिमंडल भंग करने सिफारिश
कर दी है। अब सबकी निगाहें टिकी है कि एनडीए का जो हिस्सा हैं,वो क्या मोदी
को प्रधान मंत्री आसानी से बन जाने देंगेे या फिर बारगनिंग करेंगे?
चंद्रबाबू नायडू और नितिश के हाथ में सत्ता की चाबी है। सबसे बड़ा सवाल यह
है, कि नितिश के साथ मोदी ने जो किया क्या वो भूल जाएंगे? चंन्द्रबाबू
नायडू को जेल में डाल दिया गया था।उनके खिलाफ जीएसटी, इंटेलिजेंस,आईटी,ईडी
सहित कई एजेसियां इसकी जांच कर रही हैं।
गुजरात
लाॅबी की मजबूरी - लोकसभा चुनाव के समय मोदी ने नितिश को मंच में साझा
नहीं किया था। उनका सियासी अपमान खूब किये थे। क्या वो अब जब मोदी की जरूरत
बने हुए है,उनके साथ जाएंगे? चंद्राबाबू नायडू और मोदी की विचार धारा में
भिन्नता है। यही स्थिति नितिश की है। दोनों सेक्यूलर हैं। मोदी इस बार
चुनाव में खुले मंच से मुस्लिमों की खिलाफत किये हैं। वो टोपी पहनते नहीं।
उन्हें मुसलमानों का वोट चाहिए नहीं। वो जातीय गणना के खिलाफ है। मुस्लिम
आरक्षण के खिलाफ हैं। ऐसे में ये दोनों नेता क्या मोदी को प्रधान मंत्री की
शपथ आसनी से ले लेने देंगे। यदि ले भी लिये, तो कितने दिन मोदी प्रधान
मंत्री की कुर्सी में रहेंगे? सबसे बड़ा सवाल यह है, कि गुजरात लाॅबी से
जिसने भी हाथ मिलाया,उसका सियासी वजूद खत्म हो गया। या खत्म करने में कोई
कमी नहीं की गुजरात लाॅबी ने। ऐसा कोई भी नहीं है,जिसे गुजरात लाॅबी ने ठगा
न हो। उद्धव ठाकरे को मुख्यमंत्री कुर्सी से हटा दिया। उनकी पार्टी तोड़
दी। उनका सियासी सिंबल छीन लिया। शरद पवार के साथ भी यही हुआ। उनकी पार्टी
तोड़ दी। अजीत पवार को ही असली एनसीपी बना दिया। नवीन पटनायक की आज जो
सियासी हालत हुई,वो गुजरात लाॅबी की वजह से हुई। मोदी ने केजरीवाल और हेमंत
सोरेन को जेल भेज दिया। इंडिया गठबंधन में ऐसा कोई सियासी दल नहीं है,जो
मोदी से प्रताड़ित न हो। ऐसे में इंडिया गठबंधन वाले मोदी का साथ देंगे,इसमे
संदेह है। बीजेपी केा इतनी सीट नहीं मिली कि मोदी प्रधान मंत्री अकेले
अपने दम पर बन सके। मोदी की सोच और विचारधारा नायडू और नितिश सेे मेल नहीं
खाती। ऐसी स्थिति में स्पष्ट है कि नितिश उप प्रधान मंत्री अथवा गृहमंत्री
के पद के साथ ही बिहार में जेडीयू का मुख्यमंत्री बने, इसकी मांग कर सकते
हैं। यदि ऐसा हो भी गया तो मोदी को अपनी विचार धारा और लीडर शिप से अलग
जाकर हर दिन नायडू और नितिश को फोन करके,उनका सियासी हाल चाल पूछना पड़ेगा।
यानी आज के सियासी हालात में नितिश और नायडू किंग मेकर की भूमिका में है।
संघ
की पसंद बदल गयी तो..- मौजूदा सियासी हालात मोदी के पक्ष में नहीं। यदि
बात नहीं बनी तो संघ मोदी को किनारे कर नीतिन गडकरी को आगे कर सकता है।
वैसे भी मोहन भागवत और मोदी में पिछले छह माह से कुछ ज्यादा ही छत्तीस का
सियासी रिश्ता हो गया है। नागपुर में मोदी से मोहन भागवत और गडकरी बुलाने
के बावजूद नहीं मिले। यह बात मोदी को बुरी लगी। और वो वहां से आने के बाद
नड्डा के जरिये कहलवा दिये कि अब बीजेपी को संघ की जरूरत नहीं है। बीजेपी
बड़ी पार्टी हो गयी है। बीजेपी अटल के दौर से आगे निकल गयी है। लेकिन चुनाव
परिणाम बता रहे हैं,कि मोदी की बीजेपी,अटल की तरह हो गयी है। उसे भी सियासी
बैसाखी की जरूरत पड़ गयी है।मोदी चट मंगनी पट व्याह चाहते हैं। ताकि संघ को
मौका न मिले। मोदी की बैठक में अमितशाह,राजनाथ सिंह और जेपी नड्डा ही थे।
गडकरी नहीं थी। मोदी फटाफट सरकार बन जाए,इसके फिराक में है। छोटे- छोटे
राज्यों की पार्टी का समर्थन लेना मोदी की विवशता रहेगी। मेघालय,
नागालैण्ड,मिजोरम,मणिपुर आदि राज्य की पार्टियों से अमितशाह और मोदी बात कर
रहे हैं। यदि ये इंडिया गठबंधन के साथ चले गए तो मोदी के बुरे दिन आ
जाएंगे। राफेल कांड,जस्टिस रोया की हत्या कांड,पीएम फंड घोटाला, इलेक्टोरल
बांड,अडानी को बेची गयी संपत्तियां,उद्योगपतियों के माफ किये कर्ज आदि
मामले उठेगें। वैसे इडिया गठबंधन ने दो टुक कह दिया है कि डीएमके के लिए
दरवाजे खुले हैं।
बैसाखी
टूटने का संशय - केन्द्र में अबकी बार मोदी या फिर बीजेपी की नहीं बल्कि
एनडीए की सरकार होगी। लेकिन बैसाखियों के सहारे चलने वाली सरकार के
प्रधानमंत्री नरेन्द मोदी पहले की तरह ताकतवर नहीं रहेंगे। नितिश के पास
बहुत विकल्प हैं। चंन्द्रबाबू नायडू और नितिश की विचारधारा मोदी से मेल
नहीं खाती। इसलिए हमेशा संशय बना रहेगा सरकार के गिरने का। फ्लोर टेस्ट में
मोदी को विश्वास मत हासिल करना होगा। अपना लोक सभा अध्यक्ष बनाना मोदी को
इस बार कठिन हो सकता है। इतना ही नहीं रेड कारपोरेट पर मोदी को अपनी बैसाखी
देने वालों का रेट ज्यादा रहेगा। वैसे भी नितिश ने छह माह पहले ही कह दिया
था, कि जो 2014 में आए हैं,वो 2024 में नहीं आएंगे। यानी कह सकते हैं कि
अबकी बार मोदी को प्रधान मंत्री बनने के लिए नायडू,नितिश और मोहन भागवत
तीनों की जरूरत है। तेजस्वी यादव की बात को दरकिनार नहीं किया जा सकता कि
चचा चार जून के बाद कोई बड़ा फैसला ले सकते हैं।
क्या
भूल जाएंगे - नितिश क्या इस बात को भूल जाएंगे मोदी उनकी पार्टी को तोड़
कर बीजेपी की सरकार बिहार में बनाने जा रहे थे। उनके लोगों को गुजरात लाॅबी
अपने पक्ष में कर लिया था। नितिश को भनक लग गयी और वो राजद प्रमुख लालू
प्रसाद यादव से हाथ मिलाकर मुख्यमंत्री बन गए। नितिश मोदी को सबक सिखाने
ममता बनर्जी,उद्धव ठाकरे,केजरी वाल,अखिलेश यादव सहित अन्य 28 दलों को एक
मंच पर लाए। इंडिया की नीव की नितिश ने ही रखी थी। यह अलग बात है कि बीते
जनवरी में पाला बदल कर फिर एनडीए में शामिल हो गए। जाहिर है कि उनके लोग
यानी उनकी पार्टी के सारे विधायक मोदी के साथ जाने के पक्ष में नहीं है।
नितिश सेक्यूलर विचारधारा के समर्थक है। लल्लन सिंह और विजेन्द्र प्रसाद का
कहना कि नितिश मोदी के साथ न जाए।
चन्द्रबाबू नायडू
को आठ माह पहले स्किल डेवलपमेंट घोटाले (कोशल विकास मामला) पुलिस ने
हिरासत में ले लिया था। दो महीने तक जेल में थे। आंध्र प्रदेश सरकार ने
स्किल डेवलपमेंट एक्सीलेंस सेंटर की स्थापना के लिए सीमेेंस और डिजाइन टेक
के साथ 3356 करोड़ रुपए का समझौता किया था।समझौते के मुताबिक टेक कंपनी को
इस प्रोजेक्ट में 90 फीसदी हिस्सेदारी वहन करनी थी। लेकिन यह बात आगे नहीं
बढ़ी। आंध्र प्रदेश सरकार ने अपने हिस्से की हिस्सेदारी 371 करोड़ रुपए जारी
कर दिया था। आंध्र की सीआईडी ने कौशल विकास के लिए जारी फंड को दुरूप्रयोग
का आरोप लगाते हुए कहा था,सीमेंसे प्रोजेक्ट की लागत को बढ़ा चढ़ाकर 3300
करोड़ रुपए कर दिया था। पुलिस का कहना था, कि इस प्रोजेक्ट की वास्तविक लागत
58 करोड़ रुपए थी। जीएसटी, इंटेलिजेंस,आईटी,ईडी सहित कई एजेसियां इसकी जांच
कर रही हैं। मोदी के समक्ष नायडू भी कई शर्ते रख सकते हैं।
एक
समय नितिश और नायडू दोनों मोदी सरकार के खिलाफ मोर्चा खोले हुए थे। दोनों
सियासत के मजे उस्ताद हैं। यानी अब मोदी अपनी मनमानी नहीं कर पाएंगे। सत्ता
में जिनकी भागेदारी रहेगी,यदि उनकी नहीं सुनी गयी, तो हाथ खींच कर सरकार
गिरा भी सकते हैं।
ममता दोनों एन से करेंगी बात -
इंडिया गठबंधन का कहना है कि एनडीए घटक दलों के भी दरवाजे खुल हैं। वैसे
शरद पवार नितिश और चंद्रबाबू नायडू से बातें कर रहे हैं। ममता बनर्जी को
राहुल गांधी कहेगे कि वो नायडू और नितिश से बातें करें। इसलिए कि ममता
बनर्जी की इन दोनों नेताओं से पटती है। जयराम रमेश ने चंन्द्रबाबू नायडू
को 2014 में तत्कालीन प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह के उस वायदे को याद दिलाया
जिसमें आन्ध्र प्रदेश को पांच साल तक स्पेशल स्टेटस देने की बात कही गयी
थी। उन्होंने ट्वीट किया, जिसमें चंन्द्र बाबू नायडू यह कह रहे हैं,कि सभी
नेता मोदी से बेहतर हैं। चन्द्रबाबू नायडू ने कहाथा,कि आन्ध्र प्रदेश को
स्पेशल स्टेटस नहीं मिलने की वजह से उन्होंने बीजेपी को छोड़कर कांग्रेस का
हाथ पकड़ लिया था।
एक सच ऐसा भी - सुबह सबेरे के 18 मई
के अंक में मैंने लिखा था कि अबकी बार अल्पमत सरकार। उसमें जिन बातों का
जिक्र किया था, वो सारी बातें सटीक रही। बहरहाल केन्द्र में नयी सरकार के
गठन तक नित्य कई बयान चौकाने वाले आएंगे। जैसा कि जेडीयू के एलएलसी अनवर
खालिद ने कहा कि नितिश से बेहतर प्रधान मंत्री और कौन हो सकता है? वहीं आम
आदमी पार्टी के नेता गोपाल राय ने नितिश और चन्द्र बाबू नायडू से सही फैसला
लेने की अपील की है। नितिश के 12 सांसद और चन्द्र बाबू नायडू के 16 सांसद
मोदी के साथ नहीं जाते हैं तो एनडीए 264 पर आ जाएगी। अकेले बीजपी की 240
सीट है। यानी उसे 32 सीट और चाहिए। इंडिया गठबंधन के पास 234 सीट है। बैठक
में इंडिया गठबंधन फैसला करेगा कि वो विपक्ष में बैठेगा या फिर कोई खेला
करना चाहिए।
Monday, June 3, 2024
बीजेपी के बीमार होने पर कौन होंगे सियासी डाॅक्टर
"मोदी
बनाम अन्य का मुकाबला अबकी बार दिलचस्प रहा। सवाल यह है कि बीजेपी को
बहुमत नहीं मिलने पर वो बीमार हो गयी तो उसके इलाज के लिए किस- किस दल के
नेता डाॅक्टर की भूमिका में होंगे।क्यों कि बीजेपी की हर राज्य में सीटें
कम हो रही है। गुजरात लाॅबी आखिर करेगी क्या?
0 रमेश कुमार ‘रिपु’
लोकतंत्र
की तस्वीर बदलने वाली है। सोशल मीडिया में यही शोर है। वैसे मोदी बनाम
अन्य का मुकाबला अबकी बार दिलचस्प रहा। सवाल यह है कि बीजेपी को बहुमत नहीं
मिलने पर वो बीमार हो गयी तो उसके इलाज के लिए किस- किस दल के नेता
डाॅक्टर की भूमिका में होंगे?क्यों कि बीजेपी की हर राज्य में सीटें कम हो
रही है। ऐसे में गुजरात लाॅबी करेगी क्या?मोदी ने एएनआई को दिये गये
साक्षात्कार में कहा कि हिन्दुस्तान में हमारे सभी राजनीतिक दलों के नेताओं
के साथ दोस्ती है। लोकतंत्र में दुश्मनी नहीं,दोस्ती ही होती है। जाहिर है
कि उनके मन में संदेह है। एक डर है। घबराहट है। मोदी का रथ यू.पी में ही
फंस गया तो धक्का देने कौन आगे आएगा? क्यो कि अबकी बार विपक्ष बीजेपी के
वोट बैंक में सेंध लगाने में कामयाब रहा। मतदान का रूझान देखकर इडिया
गठबंधन उत्साहित है।
अपनी अपनी रणनीति - नरेन्द्र
मोदी तीसरी बार चुनाव के सिकंदर नहीं बने तो बीजेपी के पंडाल में भगदड़ मच
सकती है। गुजरात लाॅबी की नजर है कि नवीन पटनायक कमजोर हो तो उन्हें फांस
लिया जाए। विधान सभा चुनाव से पता चलेगा कि ओड़िसा की राजनीति की दशा और
दिशा। वैसे सीताराम येचूरी से नवीन पटनायक कह चुके हैँ कि मोदी पर भरोसा
नहीं किया जा सकता। जो लोग न्यूटल हैं,उन्हें बीजेपी के पंडाल में लाने हर
सियासी प्रयास होंगे। मसलन बसपा,बीजद,वाईएसआर कांग्रेस, बीआरएस आदि। इन सब
के बीच तेजस्वी यादव कह रहे हैं पिछड़ों की राजनीति को बचाने और अपनी पार्टी
को बचाने नितिश कोई बड़ा फैसला ले सकते हैं। नितिश एक बार फिर पलटी मार
सकते हैं। सरकार बनाने के लिए राहुल गांधी इंडिया गठबंधन के 28 दलों की
बैठक एक जून को कर रहे हैं। इसमें शरद पवार,अखिलेश यादव,उद्धव
ठाकरे,केजरीवाल आदि इस बैठक में बताएंगे उनकी पार्टी को कितनी सीटें मिल
सकती है। सवाल यह भी आएगा,कि यदि बहुमत नहीं मिला तो कौन नवीन पटनायक को
लाएगा। एक दो सीट अकाली दल को मिला तो कौन उनसे मिलेगा।ममता बनर्जी कह ही
चुकी हैं,कि वो इंडिया गठबंधन का हिस्सा बनना पसंद करेंगी। आंन्ध्र प्रदेश
के मुख्यमंत्री जगन रेड्डी और तेलंगाना के पूर्व मुख्यमंत्री के.सी.आर.
दोनों न्यूटल है।लेकिन केसीआर ये नहीं भूले हैं,कि मोदी की वजह से उनकी
बेटी कविता जेल में है। ये किसका साथ देंगे। चन्द्रबाबू नायडू किसका साथ
जाएंगे। इस पर भी बात होगी। सरकार बनाने के लिए एक तरफ बीजेपी की चाणक्य
मंत्रणा हेागी तो दूसरी ओर इंडिया गठबंधन की अपनी रणनाीति होगी।
गुजरात
लाॅबी को संशय - इस समय सोशल मीडिया में चर्चा है कि अपने बूते पर बीजेपी
की सरकार नहीं बन रही। हर राज्यों में उसकी सीट घट रही है। सवाल है,कि घट
रही सीट की पूर्ति किस राज्य में होगी? यूपी, बिहार, मध्यप्रदेश, राजस्थान,
गुजरात और महाराष्ट्र को मिलाकर कुल 248 सीट होती है। सन् 2019 बीजेपी
अपने सहयोगी दलों की मदद से 215 सीट जीती थी। लेकिन जिन सहयोगी दलों के
बूते बीजेपी सत्ता की सीढ़ी चढ़ी थी,वो उससे अलग हो गए हैं।
यूपी,महाराष्ट्र,और बिहार सबसे अधिक सीट वाले राज्य हैं। इन राज्यों में
बीजेपी के खिलाफ खेला होने पर बीजेपी बीमार हो सकती है। गुजरात लाॅबी को
सरकार को लेकर संशय में है। दुविधा है। यदि चुनाव पलटा तो किसके हाथ में
होगी सत्ता। संघ की भी नजर 4 जून की चुनाव परिणाम पर है, यदि सरकार नहीं
बनी तो संघ नितिन गडकरी को आगे कर सकता है.एक जून को अंतिम चुनाव है। मोदी
एक जून को खुद पर फोकस कराने के लिए वे कन्याकुमारी में 48 घंटे का ध्यान
कर रहे हैं। ये भी वोट पाने का हथकंडा है। पिछले एक पखवाड़े से अस्थिर सरकार
के अंदेशे में शेयर बाजार गिर रहा है। सोने-चांदी की कीमतें बढ़ रही है।
निगाहें
नितिश पर - चुनाव परिणाम से पहले आज तक के राजनीतिक विश्लेषक प्रदीप
गुप्ता का दावा है 2019 जैसी बीजेपी की स्थिति है। प्रशांत किशोर कह रहे
हैं 303 सीट बीजेपी कोे मिलेगी। वहीं एबीपी न्यूज के यशवंत देशमुख कह रहे
हैं,बीजेपी की सरकार बनेगी। जबकि योगेन्द्र यादव कह रहे हैं बीजेपी को
240-250 सीट मिलेगी। चूंकि इस बार हर राज्यों के क्षत्रप 2019 की तुलना में
कहीं अधिक मजबूत हैं। वो बीजेपी से सीटें छीन रहे हैं। महाराष्ट्र में
गुजराती और मराठी अस्मिता का सवाल है। वहीं बिहार में मोदी से पूरे चुनाव
में नितिश नाराज रहे । मोदी ने उनके साथ मंच साझा नहीं किया। नितिश धर्म
निरपेक्षता और सामाजिकता की बात की। जबकि मोदी ने चुनाव में जाति धर्म को
ले आए। जेडीयू का वोटर बीजेपी में शिफ्ट हुआ नहीं। यदि नितिश इस बार 16सीट
में 10-12 सीट जीत गए और बीजेपी को बहुमत के लिए इतनी ही सीट की जरूरत पड़ने
पर क्या वो पलटी मार सकते हैं? उनका कहना था,जो 2014 में आए हैं,वो 2024
में नहीं आएंगे। जैसा कि तेजस्वी ने कहा कि चार जून को चचा कोई बड़ा फैसला
लेंगे। वैसे जेडीयू में दो खेमें हैं। लल्लन सिह और विजेन्द्र यादव आरजेडी
के साथ जाना चाहेंगे। कुछ लोग बीजेपी के पक्षधर हैं। जबकि सामाजवादी
विचारधारा वालों का जेडीयू में बहुमत है। नितिश को जरा भी संदेह हुआ कि
उनकी पार्टी को खत्म करने की साजिश हो रही है तो वो पाला बदल देंगे।
क्षत्रपों
की राजनीति बुरे दौर में - मोदी ने ज्यादातर दलों के घर ईडी,सीबीआइ और
आइटी भेजकर परेशान किया। यानी मोदी के समय राज्यों के क्षत्रपों की राजनीति
बुरे दौर में थी। उत्तराखंड,गोवा,कर्नाटक,मध्यप् रदेश और महाराष्ट्र
की राजनीति को विपक्ष भूला नहीं है। राहुल जिस आरोप के बूते खड़े रहे पूरे
चुनाव में,उसनेे विपक्ष को ताकत दिया है। हिम्मत दिया है। माना जा रहा है
कि राहुल गांधी भारत जोड़ो यात्रा और न्याय यात्रा के साथ न्याय गारंटी न
लाते तो वोटर का नजरिया न बदलता। वैसे भी मोदी के शासन में 651 योजनाओं को
पैसा लाभार्थियों तक गया नहीं।
बीजेपी
की रफ्तार धीमी हुई - देश की राजनीति में तीन नेताओं ने अपनी रेखाएं खींच
दी है। अखिलेश यादव,उद्धव ठाकरे और तेजस्वी यादव। इन तीन नेताओं की वजह से
बीजेपी और एनडीए की रफ्तार धीमी हुई है। मोदी ने उद्धव ठाकरे की पार्टी तोड़
दी। उनकी सरकार गिरा दी। उनकी पार्टी का सिंबल छीन लिया। ऐसे में मोदी का
साथ उद्धव नहीं देंगे।शरद पवार चार जून के बाद अपनी पार्टी का विलय
कांग्रेस में कर देंगे। कांग्रेस यह मानकर चल रही है कि उसे 100-120 सीट
मिल रही है।
बीजेपी की हार
की वजह - बीजेपी की सरकार नहीं बनने की वजह स्वयं बीजेपी के नेता चार जून
के बाद गिनाने लगेंगे। लेकिन देखा जाए तो बीजेपी के नेताओं से कई गंभीर चूक
हुई है। मसलन बीजेपी राम मंदिर को लेकर अति आत्मविश्वास में आ गयी। राम
मंदिर मुद्दा नहीं बना तो वो कांग्रेस के घोषण पत्र में मुस्लिम लीग की
छाया बताकर वोटरों को मोदी ने दिगभ्रमित किया। पूरे चुनाव को हिन्दू-
मुस्लिम में बदलने की कोशिश किया। चुनाव का ध्रुवीकरण करने की कोशिश की
गयी लेकिन सफल नहीं हुए। हिन्दू को डराने कीे कोशिश किया। मोदी ने इस चुनाव
में भाषा का संस्कार भूल गए। मुजरा तक आ गए। इस बार पुलवामा कांड जैसा कुछ
नहीं हुआ। इस वजह से बीजेपी को राष्ट्र भक्ति का वोट नहीं मिला। विपक्ष
जनहित के मुद्दों को आधार बनाया। संविधान बचाने की बात से लेकर बेरोजगारी
और महंगाई को मुद्दा बनाया।
बहरहाल मोदी को शिकस्त
देने मोदी विरोधी दल इस चुनाव में लामबंद हुए हैं। और अपनी ताकत की नुमाइश
भी किये हैं।वहीं मोदी की छवि को इस चुनाव में उनके बयान से जबरदस्त धक्का
लगा है। हिलोरें मारता विपक्ष का आत्मविश्वास बीजेपी के चार सौ पार के नारे
के बीच लोकतंत्र की एक नयी तस्वीर बनाने आतुर है।
Saturday, May 25, 2024
संघ से पंगा सस्ता या महंगा,
सांस्कृतिक ताकत से सियासी मशीन में तब्दील संघ के क्या बुरे दिन आने वाले हैं? अब बीजेपी को संघ की जरूरत नहीं है कहकर जे.पी.नड्डा ने केवल चौकाया ही नहीं है,बल्कि संकेत दे दिया है, कि पार्टी में अब आदेश नागपुर का नहीं, गुजरात लाॅबी का चलेगा। चार जून को बीजेपी को बहुमत नहीं मिला तो संघ प्रमुख गुजरात लाॅबी को दर्शक दीर्घा में बिठा देंगे और परिणाम उल्टा हुआ तो संघ का वजूद मोदी खत्म कर देंगे।
-- रमेश कुमार ‘रिपु’
क्या वाकई में मोदी की बीजेपी बदल गयी है! उसकी चाल। उसका चेहरा। उसका चरित्र। और शुचिता अब 2014 जैसी नहीं है। इसीलिए अब बीजेपी को संघ की जरूरत नहीं। क्या वाकई में अकेले अपने दम पर बीजेपी इतनी मजबूत हो गयी है,कि उसे संघ की जरूरत नहीं है। इसीलिए बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जे.पी.नड्डा ने संघ और बीजेपी में अंतर क्या है,इंडियन एक्सप्रेस को दिये गये साक्षात्कार में देश को बताया। अटल बिहारी बजापेयी के समय बीजेपी को चलाने के लिए संघ की जरूरत थी। क्यों कि उस समय बीजेपी कम सक्षम और छोटी पार्टी हुआ करती थी। आज बीजेपी पहले से अधिक सक्षम है। बीजेपी अपने आप को चलाती है। बीजेपी के नेता अपने कर्तव्य और भूमिकाएं निभाते हैं। संघ एक सास्कृतिक और समाजिक संगठन है। जबकि बीजेपी राजनीतिक पार्टी है। संघ वैचारिक तौर पर काम करता है।हम अपने मामलों को अपने तरीके से संभालते हैं। और राजनीतिक दलों को यही करना चाहिए।
नागपुर के फैसले नहीं चलेंगे-सवाल यह है,कि ऐसा क्या हो गया इन दस सालों में,कि संघ की शाखा से निकली बीजेपी को आज संघ की जरूरत नहीं है।नड्डा ने संघ से पंगा लिया या फिर उन्हें कहा गया,कि संघ को बता दो ‘किंग ऑफ बीजेपी मोदी’ का दौर है। जिसमें बीजेपी को किसी के सहारे की जरूरत नहीं है।नड्डा के बयान पर न अमित शाह कुछ बोले औरे न ही मोदी का कोई बयान आया है। इसका सीधा मतलब है,कि अभी तक जो फैसले नागपुर से लिए जाते थे,वो अब बीजेपी के लिए दिल्ली से लिए जाएंगे।यानी कह सकते हैं,कि कभी डिफरेंट विथ अदर्स का घमंड करने वाली बीजेपी ‘पार्टी विद डिफरेंस’ बन गयी। क्या यह मान लिया जाए कि सांस्कृतिक ताकत से सियासी मशीन में तब्दील संघ के बुरे दिन आने वाले हैं? अब बीजेपी को संघ की जरूरत नहीं है कहकर जे.पी.नड्डा ने केवल चौकाया ही नहीं है,बल्कि संकेत दे दिया है कि पार्टी में अब आदेश नागपुर का नहीं गुजरात लाॅबी का चलेगा। चार जून को बीजेपी को बहुमत नहीं मिला तो संघ प्रमुख गुजरात लाॅबी को दर्शक दीर्घा में बिठा देंगे और परिणाम उल्टा हुआ तो संघ का वजूद मोदी खत्म कर देंगे।
मोदी और मोहन में संवादहीनता - नड्डा के बयान से एक बात साफ है,कि मोदी और मोहन भागवत के बीच मधुर संबंध नहीं हैं। उनके बीच संवाद ठप है। जबकि अभी दो चरण के मतदान होने हैं। यू.पी.महाराष्ट्र ही नहीं,पूरे देश में इस बार संघ ने अपने हाथ खड़े कर लिए हैं। उसने बीजेपी को इस बार के चुनाव में कोई सहयोग नहीं किया। संघ की मदद से बीजेपी को हर चुनाव में दस से पन्द्रह फीसदी वोट का फायदा हो जाया करता था।इस बार संघ की चुप्पी साध लेने की वजह से राहुल गांधी दावा कर रहे हैं,कि मोदी चार जून को पी.एम.नहीं रहेंगे। चार जून को कौन पी.एम.रहेगा या देश को नया पीएम मिलता है,सब कुछ सियासी पर्दे के अंदर है। लेकिन नड्डा के बयान से बीजेपी के अंदर ही हांडी खदबदाने लगी है। शिवराज सिंह चौहान,योगी आदित्यनाथ,नितिन गडकरी,वसुंधरा राजे सिधिया,डाॅ रमन सिंह,राजनाथ और मुख्तार अंसारी आदि की निगाहें चार जून पर टिकी है। यदि बीजेपी को बहुमत नहीं मिला तो मोदी की वजह से जो हाशिये में डाल दिये गये हैं,वो सारे मोदी की सियासी रेखा को मिटाने आगे आ जाएंगे।
दो विचारधारायें जन्मी - सन् 1925 में गठित संघ भाजपा की कमान अपने हाथ में रखने के मकसद से हर प्रदेश में संगठन मंत्री का पद देकर अपना एक प्रतिनिधि भेजता आया है। यही संगठन मंत्री धीरे-धीरे माल कमाने वाले नेताओं के रूप में भाजपा को चलाने लगे। तभी से संघ में राजनीति को लेकर दो विचारधाराएं आकार लेने लगी। संघ के लोग बीजेपी में आकर विलासी जीवन जीने लगे। ऐसे लोग वापस संघ में जाना नहीं चाहते।मोदी इस पर लगाम लगाना चाहते हैं। देखा जाए तो संघ स्वयं अपने गठन के सिद्धातों से दूर होता चला गया है। भाजपाइयों और सत्ता लोलुपता वालों पर संघ नकेल नहीं लगाता है। संघ का बीजेपी में पकड़ कमजोर करना चाहते हैं मोदी।पार्टी में कई नेता संगठन से बड़े बनने की कोशिश पहले भी करते आए हैं। यूपी में कल्याण सिंह,राजस्थान में वसुंधरा राजे सिंधिया,कर्नाटक में येदुरप्पा,मध्यप्रदेश में शिवराज सिंह,नागपुर में नितिन गडकरी आदि। मोदी मानते हैं कि ऐसे लोगों की वजह से पार्टी को नुकसान होता है। मोदी अपनी शर्त पर काम करते हैं। मोदी की खिलाफत जो करता है,उसे वो किनारे करने में जरा भी देर नहीं करते। संजय जोशी का मामला सभी जानते हैं।
बीजेपी पर संघ का दबदबा रहा है। चाहे चुनाव के दौरान उम्मीदवारों का चयन हो या फिर भाजपा के शीर्ष नेता को बदलने का।मोदी अपनी जिद की करते रहे। मोहन भागवत के अति करीबी नितिन गडकरी से उनका कई विभाग छीन लिया। उनके खिलाफ कार्रवाई करना चाहते थे। सीएजी की रिपोर्ट के बाद एनएचएआई अधिकारी अरेस्ट किये गए। नितिन गडकरी को भी अरेस्ट करके मोदी अपने रास्ते से हटाना चाहते थे।लेकिन मोहन भागवत के दखल पर चुप हो गये। संघ चूंकि शाखाओं पर आधारित संगठन है।जो गांव से लेकर शहर तक फैला हुआ है। इन्हीं से निकल कर बीजेपी के नेता आते हैं। अब शाखाएं सिमट गयी तो बीजेपी के कार्य कर्ता बनने लगे। इससे इंकार नहीं है,कि सत्ता सुख की गोद में बैठने वाले संघ के लोग भाजपा पर निर्भर हैं।
बीजेपी से बड़े मोदी - सन् 1977 में जन संघ का जनता पार्टी में विलय हो गया था। जनता पार्टी छिन्न भिन्न हो गयी थी। तब जनसंघ की नीतियों की कोख से बीजेपी का जन्म हुआ। अटल बिहारी बाजपेयी जैसे शब्दों के जादूगर की अगुआई में बीजेपी ने चलना शुरू किया और सत्ता के मंजिल तक पहुंची। मोदी ने अटल की बीजेपी को एक नयी ऊंचाई तक पहुंचाया। देश की सबसे बड़ी पार्टी बनाया। राममंदिर बनाया। धारा 370 खत्म किया। तीन तालाक खत्म किया। कांग्रेस से लड़ते-लड़ते बीजेपी बीजेपी का कांग्रेसी करण हुआ। जो कुछ बचा था,उसे मोदी ने पूरा कर दिया। जिन कांग्रेसियों को भ्रष्ट नेता कहा जाता था,उन सभी को मोदी ने ई.डी.सीबीआइ और आइ.टी का डर दिखाकर बीजेपी में शामिल कर लिया। आज मोदी बीजेपी से भी बड़े बन गए है।
बीजेपी का नया वोट बैंक - बीजेपी ने संघ के हिन्दुत्ववादी ऐजेंडे से बाहर जाकर सोशल इंजीनियरिंग का एक नया वोट बैंक तैयार कर लिया है। इसलिए नड्डा ने कहा,कि अब भाजपा की मथुरा और काशी के विवादित स्थलों पर मंदिर बनाने की कोई योजना नहीं है। जबकि मोहन भागवत चाहते हैं,केन्द्र में हिन्दूवादी सरकार रहे।और भारत,हिन्दू राष्ट्र बने। चूंकि 2025 में संघ अपना शताब्दी वर्ष मनाने जा रहा है। लेकिन मोदी अपनी राह चुनने का फैसला किया है। सन् 2014 में मोदी जब पी.एम.बने वो संघ कार्यालय नहीं गए। जबकि मोहन ने कहा था,यह जीत किसी एक व्यक्ति की नहीं,इसमें लाखों करोड़ों संघ के लोगों का भी योगदान है। सन् 2015 में दिल्ली में मध्यप्रदेश सरकार के मध्याचंल भवन में केन्द्र सरकार के मंत्रियों की तीन दिन तक संघ प्रमुख ने एक -एक करके तलब किया था। भाजपा पर अपने नियंत्रण का प्रदर्शन किया था। मोदी को भी जाना पड़ा था। इसके बाद फिर ऐसी बैठक नहीं हुई। मोदी को यह अच्छा नहीं लगा। उसके बाद से गुजरात लाॅबी ने संघ को तवज्जो देना बंद कर दिया। राम मंदिर उद्घाटन के समय भी मोदी ने मोहन भागवत को पूजा स्थल पर बिठाने की बजाए दर्शक दिर्घा में बिठा दिया था। तत्कालीन सर संघ संचालक गुरु गोलवलकर ने भारतीय जनसंध की स्थापना के बाद 1951 में कहा था,जब तक इसकी जरूरत होगी चलाएंगे। वर्ना बंद कर देंगे। यानी पार्टी को यह अंदेशा था, आगे चलकर इसे बंद करना ही पड़ेगा। और मोदी इसी दिशा में अपना कदम बढ़ा दिये है।
मोदी मोदी कहना होगा - जे.पी.नड्डा के बयान के जरिये गुजरात लाॅबी ने यह संकेत दे दिया है कि बीजेपी में रहना है तो मोदी मोदी कहना होगा। जो लोग दावा कर रहे थे, कि भाजपा में व्यक्ति नहीं संगठन बड़ा है। उन्हें जे.पी.नड्डा के बयान से समझ लेना चाहिए।यह अलग बात है कि पीएम मोदी तमिलनाडु,उत्तराखंड के बाद महाराष्ट्र चुनाव प्रचार करने गए।दूसरे चरण के प्रचार के लिए वर्धा आकर नागपुर में जान बुझकर विश्राम किया। उनसे संघ और बीजेपी के छोटे पदाधिकारी और कार्यकर्ता राजभवन में मिलने गए। मगर नितिन गडकरी और मोहन भागवन नहीं मिले। दोनों का उनसे न मिलना मोदी को नागवार गुजरा। इस घटना का सियासी धमाका होना ही था। और दो चरणों के बकाए चुनाव से पहले जो धमाका गुजरात लाॅबी ने जेपी नड्डा के जरिए किया उससे पूरी बीजेपी स्तब्ध है। चार जून को मोदी का रथ नहीं रूका तो मोहन भागवत चाहकर भी मोदी की जगह किसी और को पी.एम.का दायित्व दे पाएंगे,इसमें संदेह है। वैसे पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का संघ सरकार्यवाह होसबोले से बंद कमरे में एक घंटे बात करना और भैयाजी जोशी से चालीस मिनट तक बातें करना, कई सियासी संदेहों को जन्म देता है। जाहिर सी बात है शिवराज को मुख्यमंत्री नहीं बनाए जाने से गुजरात लाॅबी से वो नाराज हैं। वसुंधरा राजे सिधिया भी चार जून के चुनाव परिणाम का इंतजार कर रही है। वसुंधरा राजे सिंधिया सन् 2014 और 2019 में सक्रिय थी,तब बीजेपी को 25 में से 25 सीट राजस्थान में मिली थी। लेकिन इस बार करीब 18 सीटें मिलने का दावा किया जा रहा है। चुनाव परिणाम से पहले वसुंधरा राजे सिंधिया का संघ के ऑफिस और राजभवन पहुंचने से सियासी हलचलें तेज हो गयी हैं। वहीं अमितशाह दावा कर रहे हैं 380 सीटों पर हुए चुनाव में बीजेपी को 270 सीट मिल रही है। वहीं चुनाव आयोग जो बीजेपी के लिए चुनाव लड़ रहा है,उसने हर राज्य में वोट प्रतिशत बढ़ा कर विपक्ष को संशय में डाल दिया है। पिछली बार सीपीएम को कुल एक करोड़ सात लाख वोट मिले थे। चुनाव आयोग ने चार चरण के चुनाव के बाद इतना ही वोट बढ़ा दिया है। ऐसे में बीजेपी का रथ फंसता है या दिल्ली तक पहुंचता है,सबकी निगाहें टिकी है।
फिर संघ किसे आगे करेगा - मोहन भागवत वैसे भी चुनाव से पहले कह चुके हैं,कि केवल मोदी और हिन्दुत्व के भरोसे चुनाव नहीं जीता जा सकता।यदि बीजेपी को बहुमत नहीं मिला तो संघ नितिन गडकरी को आगे कर सकता है। और इसका समर्थन योगी,शिवराज,वसुंधरा राजे सिंधिया,डाॅ रमन सिंह आदि करने से पीछे नहीं हटेंगे। मोदी और सघ के बीच तलवार अब खिंच गयी है। देखना यह होगा,कि आधुनिक और राजनीतिक रूप से असरकारी संगठन चार जून के बाद कितना मजबूत है। देश प्रेम की नयी आभा क्या रग दिखाती है।
Tuesday, May 21, 2024
दो लड़कों ने यू.पी.में बीजेपी की बाजी पलट दी
''मोदी-शाह के अभेद्य चुनावी कवच की दरारों को यू.पी.में अखिलेश और राहुल की जोड़ी ने उघाड़ दिया है। चुनावी मतदान का प्रतिशत और मतदाताओं में बीजेपी विरोधी रूझान ने मोदी-अमितशाह को सियासी फलक से नीचे ला दिया है। फैलती भाजपा को अब खतरा महसूस होने लगा है। सवाल यह है कि दलित,पिछड़ा वर्ग और मुस्लिम वर्ग क्या मोदी का रथ यूपी में ही रोक देगा?
-रमेश कुमार ‘रिपु’
क्या उत्तर प्रदेश में खाक से उठ खड़ी होगी अबकी बार कांग्रेस! पिछले दो चुनाव में कांग्रेस को झन्नाटेदार हार के पराजय का मुंह देखना पड़ा था। बेल की तरह फैल चुकी बीजेपी से एनडीए के सहयोगी दलों का मोहभंग होने के बाद मोदी विरोधी दलों का गठबंधन कमल को नोचने लगेगें,इसकी कल्पना मोदी-अमितशाह कभी नहीं किये थे।अबकी बार यूपी की सियासी जमीन से कमल को जड़ से उखाड़ने के लिए राहुल और अखिलेश ने जो रणनीति अपनाई है,उससे बीजेपी के तंबू में सनाका खिंच गया है।इसलिए कि यूपी में जो सियासी हवा चल रही है,उसे रोकने की काट गुजरात लाॅबी के पास नहीं है। यह बात अब तक के हुए चुनाव ने साफ कर दिया। मोदी का रथ यू.पी.से दिल्ली जा पाएगा,इसमें संदेह गहरा गया है। सन् 2014 में मोदी की जो लहर थी,वैसी लहर सन् 2019 में नहीं थी। बावजूद इसके 65 सीट बीजेपी पा गयी थी। अबकी बार न लहर है। और न ही हवा है।यही वजह है कि मोदी-शाह के अभेद्य चुनावी कवच की दरारों को यू.पी.में अखिलेश और राहुल की जोड़ी ने उघाड़ दिया है। चुनावी मतदान का प्रतिशत और मतदाताओं में बीजेपी विरोधी रूझान ने मोदी-अमितशाह को सियासी फलक से नीचे ला दिया है। फैलती भाजपा को अब खतरा महसूस होने लगा है। सवाल यह है कि दलित,पिछड़ा वर्ग और मुस्लिम वर्ग क्या मोदी का रथ यूपी में ही रोक देगा?
गुजरात लाॅबी का भरेासा टूटा - वैसे गुजरात लाॅबी को पूरा भरोसा था,कि राहुल गांधी के जातिगत जनगणना और आरक्षण का मुद्दा राम मंदिर की लहर में उड़ जाएगा। अखिलेश के अगड़े- पिछड़े की की राजनीति जो राम को लाए हैं,उन्हें लाएंगे के नारे में नहीं ठहरेगा। लेकिन गुजरात लाॅबी को हवा तक नहीं लगी कि इंडिया गठबंधन वाले चुनाव को संविधान बचाने की लड़ाई से जोड़,कर बीजेपी की पसली को चोटिल कर देंगे। दलित,अति दलित,पिछड़ा और अति पिछड़ा वर्ग में संविधान बचाने की बात ने इतना असर डाला, कि अंबेडकर जयंती में गांव-गांव में बैठक कर बीजेपी के खिलाफ हवा बना दी।इसका असर यह हुआ,कि जो दलित,अति दलित और पिछड़ा वर्ग बीजेपी का वोटर था,वो सपा या फिर कांग्रेस को वोट कर दिया। चार चरणों के चुनाव में अचानक मतदाताओं के बदलते रूख को गुजरात लाॅबी नहीं भांप पाई। आगे के चुनाव में बीजेपी कामयाबी का कोई सियासी रास्ता नहीं ढूंढ सकी, तो उसे भारी नुकसान का सामना करना पड़ सकता है। क्यों कि अखिलेश और राहुल गांधी मोदी और अमित शाह के बयानों से वोटर प्रभावित न हो इसका तत्काल जवाब मंच से देने लगे हैं।
बाजी पलटने की रणनीति - बीजेपी और मायावाती का जो बेस वोटर था,उसमें जागरूकता आई। उसे यकीन हो गया, कि बसपा की सरकार बन नहीं सकती। इसलिए कुर्मी, कुशवाहा, कटियार, वर्मा, मौर्य, पटेल, चौहान,साकेत,मुसलमान वोटर सायकिल पर बैठने लगा। 'हाथ' से हाथ मिलाने लगा। बीजेपी आश्वस्त थी,कि राम मंदिर बनने के बाद यूपी में 75 सीट आएगी। दूसरे चरण के चुनाव से मोदी के चाणक्य अमितशाह को रिपोर्ट मिली कि अंबेडकर जयंती पर सारे दलित और पिछड़ा वर्ग गांव गांव बैठक कर तय किया है कि यदि बीजेपी की सरकार आई तो संविधान बदल देगी। बाबा साहब अंबेडकर की प्रतिष्ठा का सवाल है। और वो सबके सब बीजेपी की बाजी को पलटने में लग गए।
मोदी से मुस्लिम खफा - प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी ने हिन्दू कार्ड भी खेला। उन्होंने हिदुओं को सावधान करते हुए कहा,कांग्रेस की सरकार आई तो वो राम मंदिर में बाबरी ताला लगा देगी। लेकिन मोदी की बातों का कोई असर नहीं दिखा। केन्द्रीय गृहमंत्री,यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह सहित बीजेपी कई मंत्रियों ने कांग्रेस के घोषणा पत्र को कटघरे में रखा। सबने जोर शोर से मंच पर कहा,कि कांग्रेस की सरकार आई तो देश में सरिया कानून लागू हो जाएगा। महिलाओं के मंगल सूत्र छीन लिए जाएंगे। जिनके पास दो घर उसमें एक घर लेकर अल्पसंख्यकों को दे दिया जाएगा। यहां तक एक से ज्यादा कार होने पर उसे ले लिया जाएगा। जबकि कांग्रेस के घोषणा पत्र में ऐसा कहीं नहीं लिखा था। बीजेपी के केन्द्रीय मंत्रियों के झूठ से भी बीजेपी के पक्ष में हवा नहीं बनी। लेकिन यूपी के 21.26 फीसदी मुस्लिम वोटर मोदी से नाराज हो गया। बागपत में 27 फीसदी,अमेठी में 20 फीसदी, अलीगढ़ में 19 फीसदी,गोंडा में 19.6,लखीमपुरी खीर में20 फीसदी,लखनऊ में21.46 फीसदी,पीलीभीत में 24.11 फीसदी,सिद्धार्थ नगर में 29.33 महाराजगंज में 17.48 फीसदी और मुरादाबाद,रामपुर में 50.8 फीसदी,मजफ्फर नगर में 41 फीसदी,बिजनौर में 43 फीसदी,अमरोहा में 41 फीसदी,बलरामपुर में38.51 इसके अलावा बरेली, बहराइच, संभल,हापुड़ आदि जिलों के मुस्लिमों को मोदी ने नाराज कर दिया।। यूपी के 75 जिलों में मुस्लिम वोटर की संख्या इतनी है कि वो किसी भी पार्टी की हार जीत की दिशा बदल सकते हैं। काशी के तीस लाख मुस्लिम वोटर इस बार मोदी को वोट करेंगे इसमें संदेह है।
राम मंदिर मुद्दा नहीं बना - बीजेपी राम मंदिर को मुद्दा नहीं बना सकी। सन् 2014 के चुनाव में रायबरेली ही विपक्ष के पास था। बीजेपी 2024 के चुनाव में इस सीट को जीतना चाहती है। अदिति सिंह लखनऊ में प्रचार कर रही हैं। मगर वो अयोध्या, और अमेठी नहीं गयी। संजय सिंह अमित शाह से मिलने के बाद भी निष्क्रिय दिखाई दे रहे हैं। राजा भैया ने बकायदा अपने समर्थकों को कह दिया है,जो प्रत्याशी आपको बेहतर लगे उसका प्रचार करें और वोट दें। उनके समर्थक और वोटर समझ गए कि राज भैया किसे वोट करने को कह रहे हैं। कौशाम्बी बीजेपी की सीट फंस गयी है। पांचवे चरण की 14 सीट में 13 सीट बीजेपी के पास है। इसमें सात सीटों में कोंटे का टक्कर है। लोकसभा की 14 सीटों में विधान सभा की कुल 71 सीटें आती है। जिसमें 45 सीट बीजेपी के पास है।
यूपी मे नरेटिव बदलता रहा- उत्तर प्रदेश में गेरूआई राजनीति की पताका उम्मीद से कम लहरा रही है। उसकी वजह यह है कि योगी आदित्यनाथ ने हाथ खींच लिया है। क्यों कि उन्हें पता है कि अमितशाह लोकसभा चुनाव के बाद उन्हें सी.एम.पद से हटा देगे। यूपी में नरेटिव बदलता जा रहा है। अमेठी में जो कह रहे थे,कि राहुल गांधी के चुनाव नहीं लड़ने से स्मृति इरानी को वाॅक ओवर मिल गया,अब वही आकलन कर रहे हैं,कि किशोरी लाल शर्मा कितने लाख से स्मृति को हराएंगे। बीजेपी के खिलाफ बाजी पलटने का सबब बीजेपी के नेता हैं। जनवरी मे जो उत्साह बना था,उसी उत्साह में मोदी ने कहा था कि अबकी बार चार सौ पार।अनंत हेगड़े,अरूण गोविल,लल्लू सिंह और ज्योति मिरधा ने कहा,संविधान बदलने के लिए मोदी को चाहिए चार सौ के पार सीट। इस बात को इंडिया ने लपक लिया। और अपने हर मंच पर संविधान बदलने की बात जोर-शोर से कहने लगे। उसका असर यह हुआ कि बीजेपी का वोटर उनके हाथ से फिसल गया। बीजेपी को लगा,राहुल गांधी की बातों को वोटर गंभीरता से लेता नहीं। अखिलेश यादव पांच साल तक निष्क्रिय रहे,इसलिए राम मंदिर की लहर में उनकी बात दब जाएगी।
अखिलेश की सोशल इंजीनियरिंग - अखिलेश यादव ने सोशल इंजीनियरिंग के फार्मूले के तहत टिकट बांटा। दस कुर्मी,आठ मौर्य,पांच कश्यप,पांच निषाद,और अपने परिवार को छोड़कर किसी यादव को टिकट दिया नहीं।मेरठ,फैजाबाद की सामान्य सीट पर भी उन्होने दलित को टिकट दिया। उसका नतीजा यह रहा है कि दलित,पिछड़ा वर्ग और मुस्लमान वोटर सपा और कांग्रेस को जा रहा है। बीस फीसदी दलित,दस फीसदी ओबीसी और पन्द्रह फीसदी मुस्लिम वोटर इंडिया गठबंधन को जा रहा है यानी 45 फीसदी वोट पा रहे हैं। ठाकुर और ब्राम्हण वोटर को जोड़ दें तो यह प्रतिशत और ज्यादा हो जाता है। राजपूत भी बीजेपी से नाराज है। करणी सेना भी यूपी में सक्रिय हो गयी है बीजेपी के खिलाफ। ऐसे में बीजेपी का फिसलना ही था।
बीजेपी की साख पर संकट - बीजेपी ने देश को बड़ा करने का सपना दिखाया। दूसरी ओर देश को कर्ज में डूबाते गए। देश पर मोदी के दस साल के कार्यकाल में 272 लाख करोड़ रुपए का कर्ज है। खाद्यान योजना बिल कांग्रेस ने लाया था। आज मोदी सरकार देश में 85 करोड़ गरीब जनता को पांच किलो का अनाज दे रही है। राहुल ने कहा,हमारी सरकार आएगी तो दस किलो देंगे।वहीं हर गरीब महिला को लखपति बनाएंगे। हर पार्टी का अपना अपना घोषणा पत्र है। बीजेपी को मात देने इंडिया गठबंधन ने विशेष रणनीति बनाई। हर दिन कोई न कोई पार्टी देश में बीजेपी के खिलाफ पहले प्रेस कांफ्रेस करती है,उसके बाद चुनाव प्रचार।धर्म आधारित राजनीति बीजेपी करने की योजना बनाई थी, लेकिन कामयाब नहीं होने से बीजेपी की साख पर संकट गहरा गया है। मोदी ने देश से पचास दिन मांगे थे।अब दस साल बाद यूपी का बेरोजगार वोटर उनके काम काज पर आंकलन करने लगा है। बेरोजगारी,मंहगाई,संविधान बदलने, आरक्षण,और जातिगत जनगणना कि बात करके यूपी में दो सियासी लड़के बीजेपी की चुनावी बाजी पलट दिये हैं ।
Monday, May 20, 2024
अबकी बार अल्पमत सरकार
"अबकी बार
मोदी बनाम जनता का चुनाव है। विपक्ष का दावा है कि बीजेपी को बहुमत नहीं
मिल रहा है। चार सौ पार का नारा महौल बनाने का था। इससे इंकार नहीं है कि
सभी राज्यों में बीजेपी को नुकसान हो रहा है। बावजूद इसके बीजेपी बड़ी
पार्टी बनकर उभरेगी।"
-- रमेश कुमार ‘रिपु’
विपक्षी
खेमें में जश्न है। सभी क्षेत्रीय पार्टियों के क्षत्रप दावा करने लगे
हैं, कि बीजेपी को बहुमत नहीं मिल रहा है। जैसा कि राहुल गांधी कह रहे
हैं,लिख कर ले लो,चार जून को मोदी प्रधान मंत्री नहीं बनने वाले। वो
इस्तीफा देंगे। बीजेपी 180 सीट से ज्यादा नहीं पाएगी।ममता बनर्जी का दावा
कर रही हैं कि इंडिया गठबंधन को 295 से 315 सीट मिल रही है। वहीं अखिलेश का
कहना है,बीजेपी 140 सीट पर सिमट जाएगी। अमित शाह अभी भी कह रहे हैं,चार सौ
के पार बीजेपी जा रही है। चार चरणों के मतदान के बाद इंडिया गठबंधन
आत्मविश्वास से लबलब हो गया। सबके दावे दमदार हैं। किसकी जीत और किसकी हार
होेगी, 4 जून को पता चलेगा। लेकिन चार चरणों के चुनाव की हवा बता रही है,
कि सभी राज्यों में बीजेपी को नुकसान हो रहा है। बावजूद इसके बीजेपी बड़ी
पार्टी बनकर उभरेगी।
विपक्ष
के दावे का सच चार जून को पता चलेगा। लेकिन इससे इंकार नहीं किया जा सकता
कि हर राज्यों के क्षत्रपों के खिलाफ बीजेपी का कार्यकर्ता ,पदाधिकारी और
उसका कैडर उस तरह खड़ा नहीं दिख रहा,जिस तरह वो 2014 और 2019 में खड़ा था।
जाहिर सी बात है कि जिन क्षत्रपों के दम पर बीजेपी 2019 में 303 सीट पाई
थी। और अपने सहयोगियों के साथ मिलाकर 352 सीटें पाई थी। इस बार का चुनाव
मोदी बनाम जनता का हो जाने की वजह से मोदी के पक्ष में वो लहर कहीं नहीं
दिखी। सन् 2019 में चौथे चरण के चुनाव में बीजेपी 96 में से 42 सीट जीती
थी। 11 सीट इंडिया गठबंधन के खाते में गयी थी। वहीं 35 ऐसी सीटें थी,जो
किसी भी गठबंधन का हिस्सा नहीं थे। 2019 के चुनाव जैसा 2024 का चुनाव नहीं
है। तब बीजेपी 379 सीट में 206 और एनडीए को 234 सीट मिली थी। कांग्रेस को
43,यूपीए को 84 अन्य के खाते में 61 सीट आई थी।
कांग्रेस
का डर दिखाती रही - बीजेपी यह मानकर चल रही थी,कि 2024 के चुनाव में
इंडिया गठबंधन एनडीए से बहुत दूर रहेगा। जबकि
यू.पी.,बिहार,राजस्थान,गुजरात, मध्यप्रदेश,छत्तीसगढ़ और झारखंड हिन्दी
बेल्ट वाले राज्यों में भी बीजेपी को भारी नुकसान हो रहा है। यही वजह है कि
छोटे-छोटे शहर में मोदी रोड शो कर रहे हैं। जाहिर सी बात है कि उनमें
हताशा है। चुनाव का मुकाबला करीबी नहीं रहा। बल्कि बहुत अंतर से बीजेपी के
सत्ता से बाहर होने का अंदेशा बढ़ गया है। इसका असर शेयर बाजार में भी पड़ा
है। लगातार गिर रहा है। मोदी दस साल से देश को कांग्रेस से डराते आ रहे
हैं। जबकि सत्ता में बेजीपी है। इस चुनाव में भी जनता को अंधेरे में रखने
का काम मोदी ने किया। जनता से झूठ बोले। कांग्रेस के घोंषणा पत्र में जो
बात नहीं थी,उसे जनता के बीच जाकर हिन्दू-मुस्लिम की राजनीति कर हिन्दुओं
को डराने की कोशिश की। वोटों का धुव्रीकरण करने का प्रयास किया। कांग्रेस
सत्ता में आई तो महिलाओं के मंगल सूत्र छीन कर मुस्लिमो को दे देगी।
कांग्रेस के घोंषणा पत्र में मुस्लिम लीग की छाया है। कांग्रेस सत्ता में
आई तो मुस्लिमों का आरक्षण बढ़ा देगी। लेकिन मतदाता न डरा और न ही बदला।
राम
वाले अच्छे दिन भी लाते - महाराष्ट्र में अबकी बार बीजेपी के प्रति लहर
2019 जैसी नहीं है। राम को जो लाए है,उन्हें ही लाना है। ऐसे नारों के जवाब
में वोटर कह रहा है,जो राम को लाए हैं,वो अच्छे दिन भी लाते। दो करोड़
नौकरी भी देते। महंगाई कम करते। बेरोजगारी दूर करते। किसानों की आय दोगुना
करते। गैस सिलेंडर चार सौ रुपए में देते। सिर्फ राम लाने से काम नहीं
चलेगा। मंदिर बनने से पहले भी राम सबके मन में थे,आज भी हैं। दरअसल ,देश के
वोटर की मानसिकता बदल गयी है। वो क्या सोचने लगा है औरंगाबाद लोकसभा सीट
से समझा जा सकता है। औरंगाबाद कभी मराठा आंदोलन का केन्द्र था। 1988 में
मराठा एंटी मुस्लिम में तब्दील हो गया था। औरंगाबाद मुस्लिम बाहुल सीट है।
यहां एआईएमआईएम की पार्टी के इम्तियाज जलील को जनता वोट करती आई है। लेकिन
इस बार ऐसा नहीं है। उद्धव ठाकरे की पार्टी से चुनाव लड़ रहे चन्द्रकांत
खैरे को मुस्लिमों ने वोट किया। उनका कहना है,इम्तियाज जलील हमारी जाति
बिरादरी के हैं। लेकिन इस बार उद्धव ठाकरे को वोट करेंगे तो राहुल को
जाएगा। उनका हाथ मजबूत होगा। एकनाथ शिंदे ने संदीपन भुमरे को उतारा है।
औरंगाबाद सीट को अविभाजित शिवसेना ने 1989 के बाद से छह बार जीता है। एकनाथ
शिंदे की शिवसेना और उद्धव ठाकरे की शिवसेना के उम्मीदवार आमने-सामने हैं।
पूरे महाराष्ट्र की 48 सीट में 13 सीट पर उद्धव ठाकरे के उम्मीदवार चुनाव
लड़ रहे हैं। यह चुनाव बतायेगा,असली शिवसेना कौन है। चुनाव की हवा बता रही
है,उद्धव ठाकरे महाराष्ट्र में किंग मेकर हैं। जिस मोदी ने उद्धव ठाकरे की
कुर्सी छीन ली। पार्टी का सिम्बल छीन लिया। उसके प्रति जनता में सैम्पैथी
बेहद ज्यादा है। शरद पवार,उद्धव ठाकरे और राहुल गांधी की जोड़ी मोदी पर भारी
पड़ रही है। इस बार तीनों की जोड़ी की वजह से बीजेपी को 48 में से 12-15 सीट
ही मिलती दिख रही है। उसकी वजह यह है कि बीजेपी बंटी हुई है। पूरे
महाराष्ट्र में दूसरी पार्टी से बीजेपी में आने वालों की वजह से बीजेपी का
जमीनी कार्यकर्ता घर बैठ गया है। यह स्थिति हर राज्य की है। संघ और बीजेपी
के पुराने लोग नाराज हैं। जमीनी कार्यकर्ता कह रहे हैं,दो आदमी बीजेपी को
नहीं चलाएंगे। बाहरी पार्टी से आए उम्मीदवारों को लेकर पार्टी में भारी
असंतोष है। इन्ही वजहों से किसी भी राज्य में बीजेपी 2019 में जितनी सीट
पाई थी, उतनी उसे नहीं मिल रही है।
यू.पी.में
बीजेपी पिछड़ रही - देश में सबसे बड़ी आबादी वाला राज्य उत्तर प्रदेश
राजनीति में धुरी की भूमिका निभाता है। क्यों कि यहां लोकसभा की 80 सीटें
हैं। अब तक 14 प्रधानमंत्री में से नौ इसी राज्य ने दिये। इस बार यू.पी
बदला हुआ है। यहां वोट का प्रतिशत सात फीसदी कम है। जबकि दो फीसदी कम मतदान
होने पर सरकार बदल जाती है। यही ट्रेंड अगले तीन चरण के चुनाव में रहा तो
बीजेपी की सीट 2019 से भी कम हो जाएगी। माना जा रहा है बीजेपी को अधिकतम
45- 48 सीट मिल रही है।
कहावत है,जिसने जीता
यू.पी.उसने संभाला देश। इस बार हालात बीजेपी के पक्ष में नहीं। योगी की चल
नहीं रही है। मिशन 75 का लक्ष्य करने अमितशाह ने राजा भैया को बुलाया।
कौशाम्बी,जौनपुर और प्रतापगढ़ में ठाकुर राजा भैया की ही सुनते हैं। धनजंय
सिह बीजेपी के लिए काम करने को तैयार हो गए हैं,मगर राजा भैया न्यूटल हो गए
हैं। जाहिर है प्रतापगढ़ में बीजेपी ही हवा टाइट हो गयी है। यूपी में 41
सीट के चुनाव होने हैं। यूपी में दलित और मुसलमान बीजेपी के खिलाफ चला गया
है। यू.पी. का दलित कह रहा है,संविधान को बचाना है। बाबा साहब अंबेडकर की
इज्जत का सवाल है। बूथ से ऐसे लोगों को भगाया जा रहा है। छोटे
दुकानादार,किसान,और युवा परेशान हैं। उन्हें लगता था,मोदी महंगाई कम कर
देंगे, बेरोजगारी कम कर देंगे,पर ऐसा हुआ नहीं।
विपक्ष
बिखरा नहीं - सन् 2019 की तरह विपक्ष बिखरा नहीं है। उन्नाव, कानपुर,
अकबरपुर, सीतापुर, मथुरा, सम्भल, बरेली, सीकरी, आगरा, मैनपुरी, फिरोजाबाद,
बदायूं, एटा,आंवला, और हाथरस आदि ऐसे स्थान हैं,जहां मतदाताओं ने सत्ता
बदलने का मन बना लिया है। राजनीति के ठेकेदारों के हाथ से यह चुनाव निकल
गया। विधान सभा चुनाव में गाजीपुर की सात सीट में बीजेपी के पास एक भी
नहीं। आजमगढ़ की दस सीट में भी यही हाल रहा। अयोध्या की चार सीट में दो सीट
है बीजेपी के पास,बलिया की सात सीट में सिर्फ दो सीट बीजेपी जीती थी। ऐसे
दर्जनों विधान सभा में बीजेपी की सीट है नहीं या फिर बहुत कम है। जाहिर सी
बात है कि बीजेपी सीट लाएगी कहां से।
पश्चिम बंगाल
में अमितशाह 42 में से 35 सीट जीतने का लक्ष्य रखा है। यहां ममता का एंटी
वोट जो था,वो पिछली बार बीजेपी में गया। इस बार सीपीएम और कांग्रेस में जा
रहा है। 2019 में बीजेपी को 18 सीट मिली थी,जो इस बार घटकर 15 होने की
आशंका है। बिहार में चार फेस के चुनाव में जेडीयू की स्थिति ठीक नहीं है।
अगड़ा बनाम पिछड़ा की यहां लड़ाई है। कुर्मी,यादव,मुस्लिम बीजेपी को वोट नहीं
कर रह है। इसी से समझा जा सकता है कि नीतिश के दाये हाथ लल्लन सिंह चुनाव
हार रहे हैं। मोदी का रथ बिहार में भी फंस गया है। नीतिश एक बार फिर पलटी
मार सकते हैं। मध्यप्रदेश,छत्तीसगढ़ में इंडिया को चार सीटें मिलनें की
संभावना है। दक्षिण में सिर्फ कर्नाटक में 10-12 सीट बीजेपी को मिल सकती
है। बाकी अन्य राज्यों में संभावना नहीं है। दिल्ली और हरियाणा में 1-2 सीट
से ज्यादा नहीं पा रही है। यानी विपक्ष की साझेदारी सियासी ताकत के आगे
एनडीए अबकी कमजोर हो गया।
जनता
में नाराजगी -एनडीए के प्रति वोटरों में नाराजगी है। वोटर मानता है,कि
मोदी अमीर के समर्थक हैं। वे फिरकापरस्त और अल्पसंख्यक विरोधी हैं। वे
दूसरों पर अपना रोब-दाब चलाते हैं। वे सामूहिक नेतृत्व में यकीन नहीं करते।
वो जुमलेबाज हैं। वे किसान विरोधी हैं। वे बड़े मुद्दों पर खामोश रहते हैं।
नोटबंदी करके मोदी ने छोटे धंधे चौपट कर दिये। काला धन नहीं आया। उनकी
फैसले से रोजगार घटा और किसान परेशान हुए। चीजों की कीमतों में बढ़ोतरी पर
लगाम लगाने में मोदी असफल हुए। किसानों की खुदकुशी के साथ कृषि संकट,मोदी
की नाकामियों की फेहरिस्त में सबसे आगे है।
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