Monday, January 1, 2024
अर्श से फर्श पर कांग्रेस के नायक
"मध्यप्रदेश,छत्तीसगढ़ और राजस्थान में 'हाथ' से सत्ता जाने के बाद सियासत में कांग्रेस के सुहाने दौर की हवा खराब हो गयी है। कांग्रेस के नेताओं के अस्तित्व पर सवाल खड़ा हो गया है। मध्यप्रदेश कांग्रेस में कमलनाथ ही सब कुछ थे। भूपेश बघेल की अनुमति के बगैर छत्तीसगढ़ कांग्रेस सांसें नहीं ले सकती थी। राजस्थान में अशोक गहलोत को कांग्रेस सियासत का जादूगर कहती थी। उनका जादू नहीं चला। यानी कि गांधी परिवार के दुलारों के प्रति जनता की आस्थाएं अब दरक चुकी है।"
0 रमेश कुमार ‘रिपु’
तीन दिसम्बर 2023 से पहले कांग्रेस का मनोबल बहुत ऊंचा था। कई नेता यह मानकर चल रहे थे, कि मध्यप्रदेश,छत्तीसगढ़ और राजस्थान में ’हाथ’ में सत्ता आने पर कांग्रेस एक रिकार्ड बनाएगी। राजस्थान की जनता सियासी रिवाज पलट देगी। इसका दावा राहुल गांधी भी कर रहे थे। चुनावी विश्लेषक भी यही मानकर चल रहे थे,कि छत्तीसगढ़ में भूपेश सरकार दोबारा बनेगी। मध्यप्रदेश में दिग्विजय सिंह दावा कर रहे थे, कि इस बार कांग्रेस 150 से ऊपर सीट पाएगी। कोई विधायक नहीं खरीद सकेगा। पता नहीं ऐसा वो दावा कांग्रेस के लिए किये थे, या फिर भाजपा के लिए। चुनाव परिणाम के बाद से संकट के भंवर में कांग्रेस और कांग्रेसी हैं। तीन राज्यों में कांग्रेस की करारी हार से उसकी हवा बिगड़ी हुई है। लोकसभा चुनाव में कांग्रेस खड़ी कैसे हो,गांधी परिवार को कुछ सूझ नहीं रहा है। तीनों राज्यों में अगुआई करने वाले चेहरों की रणनीति कांग्रेस को जीत नहीं दिला सकी। जाहिर सी बात है, कि कांग्रेस के अंदर कुछ ऐसी खामियां थी, जिसे गांधी परिवार ने नजर अंदाज किया या फिर गांधी परिवार को अंधेरे में रखा गया।
जवाबदारी नहीं दिखी..
मध्यप्रदेश में कमलनाथ ही सब कुछ थे। कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष और स्वयं मुख्यमंत्री का चेहरा भी। कांग्रेस में पद से लेकर टिकट बंटवारे तक सब कुछ वो स्वयं फैसला करते थे। हैरानी वाली बात है, कि उन्होंने तीन -तीन सर्वे के बाद प्रत्याशियों को टिकट दिया, फिर कांग्रेस हार कैसे गयी? दिग्विजय सिंह ने कहा था, कि कांग्रेस जिन 66 सीटों पर कभी चुनाव नहीं जीती,उन सीटों पर कांग्रेस को जीताने की मेरी जवाबदारी। उनकी जवाबदारी किसी भी विधान सभा में नहीं दिखी। वर्ना कांग्रेस को 120 से अधिक सीट मिली होती। 66 सीट पर ही न सीमट जाती।
सबको क्लीन चिट..
सन् 2018 के चुनाव में कांग्रेस की कमान तीन लोगों के हाथ में थी। उस वक्त ज्योतिरादित्य सिंधिया भी थे। लेकिन 2023 के चुनाव में कांग्रेस की कमान कमलनाथ और दिग्विजय सिंह के हाथ में थी।कमलनाथ कांग्रेस के संगठनात्मक ढांचे को ठीक नहीं कर पाए केवल बयान बाजी करते रहे गये। शिवराज की अच्छे से विदायी करेंगे। दरअसल 2023 के चुनाव में लाड़ली बहना का अंडर करेंट था। जिसकी वजह से बीजेपी को 13 फीसदी वोट अधिक मिले। कांग्रेस को यह दिखा नहीं। 2003 के चुनाव में बीजेपी को 173 सीट मिली थी। तब संघ सक्रिय था। यह अलग बात है, कि कांग्रेस की हार की समीक्षा में किसी ने भी हार की जवाबदारी नहीं ली। और न ही गांधी परिवार ने किसी को दोषी ठहराया। उसकी वजह यह है कि पार्टी को फंड कमलनाथ,भूपेश बघेल और अशोक गहलोत मुहैया कराते थे। कमलनाथ बड़े व्यवसायी है। उन्हें गांधी परिवार निशाने पर ले नहीं सकता। मध्यप्रदेश में प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी को बनाया गया है। लोकसभा चुनाव के लिए कमलनाथ को फ्री करने के लिए। प्रदेश की 29 सीट में कितनी सीट कमलनाथ,दिग्विजय सिंह और जीतू पटवारी दिला सकते हैं गांधी परिवार भी नहीं जानता।
भ्रष्टाचार में डूबी कांग्रेस..
छत्तीसगढ़ में भूपेश हैं ,तो भरोसा है के नारे की हवा निकल गयी। गांधी परिवार को पूरा भरोसा था,कि उनका एटीएम बंद नहीं हो सकता। लेकिन जनता को भूपेश सरकार का भ्रष्टाचार रास नहीं आया। महादेव एप,कोयला घोटाला,शराब घोटाला और गोठान घोठाला ने गढ़बो नवा छत्तीसगढ़ की बखिया उधेड़ दी। जबकि पिछड़ा वर्ग की राजनीति को भूपेश धार दे रहे थे। राहुल गांधी भी पिछड़े वर्ग की बात करते थे। कमलनाथ संशय में थे, कि कहीं राहुल गांधी मध्यप्रदेश में किसी पिछड़े वर्ग के नेता को सीएम न बना दें। इसलिए उन्होंने पूरे चुनाव में पिछड़े वर्ग का जिक्र नहीं किया। छत्तीसगढ़ में टी.एस सिंह देव और भूपेश के बीच सियासी समझौता हुआ था, कि ढाई- ढाई साल मुख्यमंत्री रहने का। लेकिन भूपेश ने गांधी परिवार का ऐसा विश्वास जीता कि टी.एस सिंह देव का मुख्यमंत्री बनने का नम्बर नहीं लगा। प्रधान मंत्री आवास मामले की आवाज जब टी.एस सिंह देव ने उठाई तो उन्हे उप मुख्यमंत्री बना दिया गया। लेकिन दोनो के बीच पूरे पांच साल रस्साकशी की स्थिति रही। जिसका फायदा बीजेपी को मिला। राहुल गांधी और सोनिया गांधी हैराल्ड मामले में जमानत पर है। देर सबेर भूपेश बघेल महादेव एप सहित अन्य घोटाले के मामले में फंस सकते हैं। उन्हें जेल जाने से गांधी परिवार भी नहीं बचा सकता। टी.एस सिंह देव बच जाएंगे। लेकिन कांग्रेस के कई अन्य नेता फंस सकते हैं।
झगड़े में उलझी रही कांग्रेस..
राजस्थान में राहुल गांधी बड़े- बड़े दावे कर रहे थे, कि सियासी रोटी इस बार जनता नहीं पलटेगी गहलोत की सरकार फिर बनेगी। जबकि साचिन पायलट और अशोक गहलोत में तनातनी थी। प्रदेश अध्यक्ष रहने के दौरान सचिन ने पूरी मेहनत की और राजस्थान में कांग्रेस की सरकार बनी। लेकिन गुजरात में राहुल गांधी के सलाहकार रहे अशोक गहलोत को मुख्यमंत्री के रूप में इनाम मिला। तीन बार मुख्यमंत्री रहे। हर बार उनके नेतृत्व में कांग्रेस चुनाव लड़ी और मुॅंह की खायी। 2023 का चुनाव अशोक गहलोत के नेतृत्व में कांग्रेस लड़ी, मगर कांग्रेस के लिए सुहाना सियासी दौर लौट कर नहीं आया। जबकि अशोक गहलोत को कांग्रेस सियासत का जादूगर कहती थी। उनका जादू नहीं चला। जाहिर सी बात है,कि सचिन पायलट खुश हुए होंगे।
दरअसल गांधी परिवार ने तीनों राज्यों में अपने नेताओं के बीच चल रहे सियासी द्वंद का हल नहीं निकाल सकी। मध्यप्रदेश में ज्योतिरादित्य सिंधिया और कमलनाथ के बीच के सियासी झगड़े का हल निकाल लेती तो पन्द्रह महीने में कमलनाथ की सरकार न गिर जाती। राजस्थान में सचिन और अशोक गहलोत के बीच सुलह का कोई रास्ता निकाल लेती तो वहां कांग्रेस का 'हाथ' कमजोर न होता। यही स्थिति छत्तीसगढ़ की थी। टी.एस सिंह देव सरगुजा के राजा हैं। 2018 के चुनाव में 14 सीट कांग्रेस जीती थी,इस बार सभी सीट हार गयी। स्वयं टी.एस सिंह देव भी चुनाव हार गये।
कांग्रेस में गिरावट..
जाहिर सी बात है कि कांग्रेस में गिरावट लगातर आ रही है। सन् 1975 की इमरजेंसी के बाद की स्थिति हो या फिर 2004 से 2014 के बीच की स्थिति हो। बहुमत से दूर होती गयी। कांग्रेस में कई खेमे हैं, जो अपने -अपने तरीके से कांग्रेस को भेड़ की तरह हांक रहे हैं। अच्छे नेतृत्व की कमी है। कांग्रेस का भविष्य कैसा होगा, स्वयं गांधी परिवार भी नहीं जानता। तीन राज्यों में कांग्रेस की कमान जिनके हाथो में थी, उनकी राजनीति आज फर्श पर है। तीन राज्यों में ‘हाथ’ से सत्ता जाने के बाद सियासत में कांग्रेस के सुहाने दौर की हवा खराब हो गयी है। कांग्रेस के नेताओं के अस्तित्व पर सवाल खड़ा हो गया है। यानी कि गांधी परिवार के दुलारों के प्रति जनता की आस्थाएं अब दरक चुकी है।
भारत न्याय यात्रा,कांग्रेस को कितना फायदा
"राहुल की भारत न्याय यात्रा से यदि कांग्रेस नहीं सिमटती जैसा, कि मध्यप्रदेश,छत्तीसगढ़ और राजस्थान में कांग्रेस हार गयी तो उनकी राजनीति में अर्द्धविराम नहीं लगेगा। वैसे भी इस बार 2024 के चुनाव में सिर्फ दो ही पार्टी की विचार धाराएं दिखेंगी। एक बीजेपी की और दूसरी इंडिया गठबंधन की। भारत न्याय यात्रा से कांग्रेस में अच्छे दिन आने का न्याय जनता करेगी या नहीं,राहुल भी नहीं जानते।"
0 रमेश कुमार‘रिपु’
भारत जोड़ो यात्रा के बाद राहुल गांधी की भारत न्याय यात्रा क्या कोई सियासी इतिहास बना सकेगी? यह सवाल इसलिए भी है,कि सूर्य जब उत्तरायण की ओर होगा, तब राहुल गांधी मणिपुर से भारत न्याय यात्रा की शुरूआत करेंगे। उस मणिपुर से, जो हिंसा के डंडे में केवल लहूलुहान ही नहीं हुआ बल्कि,उसकी आबरू भी तार-तार होने के बाद भी सदन में न प्रधान मंत्री मोदी कुछ बोले और नही गृह मंत्री अमित शाह। जाहिर सी बात है,कि राहुल गांधी भारत न्याय यात्रा में अपने साथ कई सवाल और मुद्दों को लेकर भी चलेंगे । वैसे प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी जब चुनाव प्रचार में नहीं होते हैं,तब वो सरकारी कार्यक्रमों में होते हैं। और पार्टी का ही प्रचार करते नजर आते हैं।
सियासी परिदृश्य बदला...
राहुल की भारत न्याय यात्रा उन राज्यों से निकलेगी,जहां क्षत्रपों की अपनी सियासत है। मणिपुर से मुंबई तक 6200 किलोमीटर की यात्रा कहीं पैदल और कहीं बस से करेंगे। भारत न्याय यात्रा 14 राज्यों से यानी 85 जिले और 98 लोकसभा से होकर गुजरेगी। इन राज्यों के तहत लोकसभा की कुल 355 सीटें आती हैं। ये वो राज्य हैं,जहां कांग्रेस का पिछले दो चुनावों में प्रदर्शन बेहद ही खराब रहा। 2019 के चुनाव में कांग्रेस 355 सीटों में केवल 14 सीट पाई थी। इस समय बीजेपी के पास 236 सीटें हैं। अब सियासी परिदृश्य बदल गया है। एक तरफ भारत न्याय यात्रा होगी,दूसरी तरफ मोदी की गारंटी। सन् 2019 के चुनाव में बीजेपी के समक्ष चुनौतियां कम थी,उस वक्त इंडिया गठबंधन नहीं था। इंडिया गठबंधन यानी 28 दलों को मिलने वाला वोट 67 फीसदी है और बीजेपी 37.76 फीसदी वोट पाकर 193 सीटें पाई। जबकि एनडीए का संयुक्त वोट 603.7 मिलियन था। यानी 45 फीसदी वोट पाकर कुल 303 सीटें पाई। कांग्रेस 11 करोड़ 94 लाख वोट पाकर सिर्फ 52 सीटें पाई। कांग्रेस के नेतृत्व वाले गठबंधन ने 92 सीटें जीती थी। राहुल की भारत न्याय यात्रा से कांग्रेस का दस फीसदी भी वोट बढ़ता है, तो सदन में विपक्ष का नेता होने की हैसियत हो सकती है।
यात्रा में कई मुद्दे साथ होंगे..
भारत न्याय यात्रा कांग्रेस की यात्रा है। इंडिया गठबंधन की नहीं। ऐसे में इडिया गठबंधन के 28 दलों के राज्य में भारत न्याय यात्रा पहुंचेगी,तब उसकी आगवानी करते हैं या नहीं, इस पर विपक्ष की नजर रहेगी। यदि ऐसा होता है,तो यह मैेसेज जाएगा,कि भारत न्याय यात्रा अकेले कांग्रेस की नहीं,बल्कि इंडिया गठबंधन की है। और जनता में राहुल गांधी मणिपुर से लेकर मुंबई तक के तमाम राज्यों के सवालों को अपनी यात्रा में शामिल कर उन्हें मुद्दा बनाकर चलेंगे,तब बीेजेपी की सियासी परेशानी बढ़ सकती है। क्यों कि 146 सांसदों के निलंबन, अडानी के सवाल, बेरोजगारी,महंगाई और देश की आर्थिक स्थिति के मुद्दे होंगे ही, साथ ही किसानों की भी बात होगी।
बीजेपी का मकसद मोदी की हैट्रिक..
भारत जोड़ो यात्रा सात सिंतम्बर 2022 से 29 जनवरी 2023 तक थी। जबकि भारत न्याय यात्रा 14 जनवरी से 20 मार्च 2024 तक। भारत न्याय यात्रा की वजह यह है,कि कांग्रेस अपना वोट बैंक बढ़ाना चाहती है। कांग्रेस शासित राज्यो में न्याय स्कीम की शुरूआत भी संभव है। वहीं बीजेपी भारत संकल्प यात्रा गांव-गाव तक निकाल रही है। इसके पीछे मकसद है,मोदी की हैट्रिक सुनिश्चत करना और विकसित भारत के लाभार्थियों से संवाद कायम करना। इसके लिए 2500 कार्यक्रम के लिए वैन तैनात रहेंगे। साथ ही विकसित भारत हेल्थ कैंप भी करीब 65300 आयोजित होंगे। जिसमें महिला युवा,किसान और करीब एक करोड़ गरीब लोगों को लाना। देश के 255000 पंचायतों तक पहुंचने का लक्ष्य है। साथ ही 2019 से दस फीसदी वोट बढ़ाना है। वहीं भारत न्याय यात्रा का मकसद है 85 जिलों से गुजर कर करीब 98.7 करोड़ लोगों का ध्यान आकर्षित करना।
बीजेपी के समक्ष चुनौतियां..
दोनों बड़ी पार्टियों का सियासी एजेंडा तय है। लेकिन सीटों को लेकर इंडिया गठबंधन में कोई बात नहीं हुई,जबकि बीजेपी जनवरी के अंत तक कुछ उम्मीदवार घोषित कर सकती है। विकसित भारत संकल्प यात्रा और भारत न्याय यात्रा में से किसी एक को जनता को चुनना होगा। इन यात्राओं से किसे फायदा होगा 2024 में, कोई भी दावा नहीं कर सकता। लेकिन भारत संकल्प यात्रा के जरिए बीजेपी की नजर उन राज्यो में होगी, जहां उसकी सरकार नहीं है। पश्चिम बंगाल,जहां टीएमसी की सरकार है। तेलंगाना में कांग्रेस की सरकार है। ओड़िशा में बीजू जनता दल की है। गैर बीजेपी शासित राज्यों में बीजेपी के लिए भारी चुनौती है। इसलिए कि 2019 के चुनाव में पश्चिम बंगाल में 42 में से 18 सीटें जीती थी। टीएमसी ने विधान सभा में बीजेपी को बढ़त बनाने से रोका। बिहार में जेडीयू एलजेपी के साथ मिलकर चुनाव लड़ी थी,तब उसे 40 में से 30 सीट मिली थी। अब इंडिया गठबंधन में नीतिश हैं। महाराष्ट्र में शिवसेना के साथ मिलकर चुनाव लड़े थे, तब बीजेपी को 48 में से 41 सीट मिली थी। अब स्थिति बदल गयी है। उद्धव गुट इंडिया गठबंधन का हिस्सा हैं। झारखंड में 14 सीट है। यहां झामुमो के साथ कांग्रेस की गठबंधन सरकार है। मणिपुर और मेघालय में दो -दो सीट है। असम में 14 सीट। जिसमें नौ सीट पर बीजेपी और तीन पर कांग्रेस का कब्जा है। दो सीट कांग्रेस हार गयी। एक निर्दलीय और एक सीट एआईयूडीएफ के पास है। असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरसा दावा करते हैं, कि हम इस बार 11 सीटें जीतेंगे। मध्यप्रदेश,छत्तीसगढ़ और राजस्थान में बीजेपी विधान सभा चुनाव जीती है। तीनों राज्यों को मिला दें तो यहां लोकसभा की 65 सीटें होती है। हिन्दी भाषी राज्य दिल्ली,झारखंड,हरियाणा,हिमालचल प्रदेश,यू.पी और उत्तराखंड,एम.पी,छग और राजस्थान की मिलाकर कुल 193 सीटे होती है। कांग्रेस इन्हीं राज्यों से कम से कम 30-40 सीट भी जीत जाती है,तो बीजेपी के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकती है। हिमाचल प्रदेश की सभी चार सीटों पर बीजेपी का कब्जा है।
जरूरी है चुनाव जीतना..
सवाल यह है कि राहुल की यात्रा क्या इंडिया गठबंधन की पार्टियों पर असर डालेगी या फिर सिर्फ अपनी ही पार्टी को रिचार्ज करेगी । पिछले दिनों दिल्ली में इंडिया गठबंधन की बैठक में दिल्ली के सी.एम अरविंद केजरीवाल और बंगाल की सी.एम ममता बनर्जी ने कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे को 2024 में इंडिया गठबंधन की ओर से पी.एम उम्मीदवार बनाए जाने का प्रस्ताव रख कर अपनी मंशा जाहिर कर दी है,कि वो राहुल को पी.एम. के रूप में नहीं स्वीकारते। हालांकि खरगे ने इस बात पर जोर दिया था,कि गठबंधन को एक पी.एम चेहरा पेश करने की जरूरत नहीं है। जरूरी है चुनाव जीतना।
राहुल की भारत न्याय यात्रा से यदि कांग्रेस नहीं सिमटती,जैसा कि मध्यप्रदेश,छत्तीसगढ़ और राजस्थान में कांग्रेस हार गयी तो उनकी राजनीति में अर्द्धविराम नहीं लगेगा। उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ की मिमिक्री कर रहे टीएमसी सांसद कल्याण बनर्जी का वीडियो बनाए जाने पर उनकी सियासी मानसिकता पर उठी उंगलियों पर सवाल नहीं उठेंगे। वैसे भी, इस बार 2024 के चुनाव में सिर्फ दो ही पार्टी की विचार धाराएं दिखेगी। एक बीजेपी की और दूसरी इंडिया गठबंधन की।वैसे भारत न्याय यात्रा से कांग्रेस में अच्छे दिन आने का न्याय जनता करेगी या नहीं,राहुल भी नहीं जानते।
Monday, October 2, 2023
कांग्रेस की जमीन खिसकाने गुजरात रणनीति
"कांग्रेस कह रही है बीजेपी के सियासी गोदाम में जीताऊ उम्मीदवार नहीं हैं,इसलिए वह सांसद और केन्द्रीय मंत्रियों को विधान सभा चुनाव लड़ा रही है। जबकि बीजेपी हाईकमान ने एंटीइन्कम्बेसी को कम करने ऐसा कर रही है। जैसा कि गुजरात में किया था। मुख्यमंत्री सहित सभी मंत्रियों की टिकट काट दिये गये थे, और 156 सीटें जीती थी।
0 रमेश कुमार ‘रिपु’
चुनाव में टिकट किसी एक को मिलेगा। जीतेगा एक पक्ष, बाकी हारेंगे ही। हर पार्टी की टिकट देने की अपनी -अपनी रणनाीति है। मध्यप्रदेश,राजस्थान और छत्तीसगढ़ में होने जा रहे चुनाव में बीजेपी अपना चोला बदल रही है। रणनीति बदल दी है।उसका अपना- अपना एजेंडा हैं। होना भी चाहिए। सांसदों को टिकट दिया गया है। केन्द्रीय मंत्रियों को टिकट दिया गया है। हो सकता है कई मंत्री और विधायकों को टिकट न भी मिले। अभी तक मध्यप्रदेश की जारी 78 उम्मीदवारों की सूची में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का नाम नहीं है। इसके पीछे पार्टी की अपनी सियासी वजह है। यह माना जा रहा है,तीनों राज्यों में मुख्यमंत्री रहे चेहरे को पार्टी टिकट नहीं देगी।
डरी हुई है बीजेपी - कांग्रेस
भगवा छत्तरी के नीचे क्या हो रहा है, उसे लेकर कांग्रेस खेमें खलबली है। मध्यप्रदेश में बीजेपी की दूसरी सूची जारी होने पर विपक्ष आकलन करना शुरू कर दिया। करना भी चाहिए। लेकिन जिस तरह वह प्रचार कर रहा है। वह हैरानी वाला है। कांग्रेस कह रही है,कि बीजेपी डरी हुई है। इसीलिए उसने तीन केन्द्रीय मंत्रियों सहित चार सांसदों को टिकट दिया है। क्या विपक्ष के प्रचार का सच यही है,या फिर मोदी की रणनीति कुछ और है? केन्द्रीय मंत्रियों को विधान सभा चुनाव बीजेपी हाईकमान लड़ा रहा है,तो इसके पीछे वजह भी है। पहला यह कि चार बार के मुख्यमंत्री रहे शिवराज सिंह चौहान और बीजेपी की 18 साल की सत्ता के एंटीइन्कम्बैसी की तपिश कम करने के लिए मोदी ने ऐसा किया है। दूसरा शिवराज सिंह चौहान को अप्रत्यक्ष रूप से यह बता दिया गया कि सी.एम की कुर्सी के स्वयंवर के लिए हमने उम्मीदवार उतार दिये हैं। जो जीत कर आएगा,उन्ही में से किसी को मुख्यमंत्री की कुर्सी मिलेगी।
बड़े नेताओं का दम..
केन्द्रीय गृहमंत्री प्रहलाद पटेल पहली बार विधान सभा चुनाव लड़ेंगे। कैलाश विजयवर्गीय बीजेपी महासचिव हैं । दस साल बाद मध्यप्रदेश की सियासत का स्वाद चखेंगे। इनका कहना है, कि लड़ने की इच्छा नहीं थी। अब बड़े नेता हो गए हैं। कहां हाथ जोड़ने जाएंगे। फग्गन सिंह कुलस्ते छह बार लोकसभा और एक दफा राज्य सभा सांसद रह चुके हैं। तैंतीस साल बाद विधान सभा चुनाव लड़ेंगे। मंडला सीट से सांसद हैं । मुख्यमंत्री के प्रबल दावेदार हैं। नरेन्द्र सिंह तोमर मुरैना सीट से सांसद है। तीन दफा लोकसभा सांसद रह चुके हैं। दो बार विधायक भी। चुनाव प्रबंधन समिति के अघ्यक्ष हैं । जबलपुर के सांसद राकेश सिंह,सीधी की सांसद रीति पाठक,सतना सांसद गणेश सिंह और होशंगाबाद सांसद उदय प्रताप सिंह। बड़े नेताओ के दम पर बीजेपी चुनाव जीतना चाहती है।
गुजरात माॅडल एम.पी.में..
ऐसा लगता है बीजेपी हाईकमान कर्नाटक और हिमाचल प्रदेश की चुनाव हार के बाद गुजरात माॅडल पर चुनाव लड़ना चाहती है।जैसा कि 2021 में गुजरात की सी.एम. विजय रूपणी सहित सभी मंत्रियों का टिकट काट दिया गया था। पहली बार भूपेन्द्र पटेल को मुख्यमंत्री बनाया था और 156 सीटें बीजेपी जीती थी। वही सियासी रणनीति मोदी मध्यप्रदेश में भी अपना रहे है। यानी आने वाले सूची में कई मंत्रियों के टिकट कट सकते हैं। कई विधायकों को भी।
शिवराज की घेराबंदी...
कैबिनेट की बैठक में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने अपने मंत्रियों और अफसरों से बड़े बुझे मन से थैक्यू वेरी मच कहा। बात साफ है, कि पार्टी हाईकमान शिवराज सिंह चौहान को टिकट नहीं देना चाहती। मोदी ने शिवराज सिंह चौहान की एक तरीके से घेराबंदी की है। तीन केन्द्रीय मंत्री और चार सांसदों को टिकट देकर। मोदी की गुडबुक में शिवराज का नाम नहीं है। शिवराज को यह तभी समझ लेना चाहिए था,जब व्यापम मामले में उन्हें उनके खिलाफ सीबीआई जांच के आदेश मोदी ने दिये थे। बहरहाल इन केन्द्रीय मंत्रियों के समक्ष भी बड़ी चुनौती है और उन्हें अपना सियासी दम दिखाना है, कि वो पार्टी के केवल बड़े नेता ही नहीं हैं,बल्कि जनता के बीच भी अपना दमखम रखते है। बीजेपी में दूसरी सूची में भी मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का नाम नही होने का मतलब है कांग्रेस की उम्मीदों पर पानी फेरना। जैसा कि हाई कमान ने 2018 में कर्नाटक में बी.एस येदियुरप्पा को शिकारीपुरा से चुनाव लड़ाया था और बी श्रीरामुलु को मोलाकमुरू से, दोनो जीत गए थे। यानी एंटीइनकम्बेसी को कम करना है,तो नए उम्मीदवार उतार दो। पुराने चहेरे देख- देख कर जनता ऊब जाती है।
टिकट वितरण में तब्दीली...
मध्यप्रदेश में अभी तक 35 बीजेपी के बड़े नेता और पूर्व विधायक बीजेपी छोड़ कर कांग्रेस में शामिल हो गए हैं। कांग्रेस कह रही है बीजेपी के सियासी गोदाम में जीताऊ उम्मीदवार नहीं हैं,इसलिए वह सांसद और केन्द्रीय मंत्रियों को विधान सभा चुनाव लड़ा रही है। क्यों कि उसे शिवराज पर अब भरोसा नहीं रहा। सवाल यह है कि केन्द्रीय मंत्री और सांसदों का विधान सभा का चुनाव लड़ने पर इसे सियासी प्रमोशन कहें या फिर डिमोशन। यह ताज्जुब वाली बात है कि बीजेपी केन्द्र के लिए अपनी पार्टी का चेहरा बताती है, मगर राज्य के चुनाव के लिए नहीं। 2018 के चुनाव में जनआर्शीवाद यात्रा में शिवराज सिंह चौहान को पार्टी ने प्रमोट किया था,लेकिन 2023 केे चुनाव में नहीं। हिमाचल प्रदेश में काग्रेस ने अपनी सियासी रणनीति बदली थी। जो अपने क्षेत्र में चर्चित हैं। अपने क्षेत्र के क्षत्रप हैं। उन्हें टिकट दिया। बीजेपी भी इस बार ऐसा ही करती दिख रही है।
रक्षात्मक मुद्रा में बीजेपी..
इससे इंकार नहीं किया जा सकता कि बीजेपी रक्षात्मक मुद्रा में है। क्यों कि तीन माह पहले तक बीजेपी की स्थिति जैसी थी, वैसी अब नहीं है। पार्टी यह मानकर चल रहा है,कि उसका वोट बिखर नहीं रहा है। केवल प्रत्याशी की नाराजगी है। क्यों न प्रत्याशी बदल दिए जाएं। यह सियासी प्रयोग गुजरात की तरह सफल भी हो सकता है। जैसा कि 2019 के लोकसभा चुनाव में पार्टी ने छत्तीसगढ़,में पूरी ग्यारह सीट पर उम्मीदवार बदल दी थी। दस सीट जीती थी। यही मध्यप्रदेश और राजस्थान में हुआ। राजस्थान में कांग्रेस को एक भी सीट नहीं मिली और मध्यप्रदेश में सिर्फ एक सीट मिली।
तो कांग्रेस को नुकसान...
बीजेपी डरी है,यदि कांग्रेस यह सोच रही है, तो उसे नुकसान हो सकता है। बीजेपी में हलचल है,ऐसा कांग्रेस सोच सकती है। बीजेपी की नई रणनीति के तहत कांग्रेस को काऊंटर सोच विकसित करनी पड़ेगी। वहीं सांसद का चुनाव उम्मीदवार मोदी लहर में जीत गए, लेकिन विधान सभा चुनाव में मेहनत करनी पड़ेगी। सवाल यह है कि मोदी ने मास्टर स्ट्रोक खेला है या फिर सियासी प्रयोग किया है। वैसे मोदी भोपाल हो या फिर अन्य राज्यों में अपने एक घंटे के भाषण में पैतालीस मिनट कांग्रेस को कोसते है। सच यह है,कि मोदी कांग्रेस को कोस- कोस कर उसे खड़ा कर दिये हैं।
Friday, September 22, 2023
एंकरों का बाॅयकाॅट,टी.आर.पी.को लगी वॉट
"क्या यह मान लिया जाए कि सन् 2014 के बाद से पत्रकारिता का चेहरा बदल गया है। उसे रतौंधी और दिनौधी हो गयी है। इसलिए इंडिया गठबंधन ने नफरती एंकरों की दुकान का बाॅयकाॅट करने फैसला किया है।इंडिया गठबंधन ने जिस मीडिया को गोदी मीडिया का नाम दे रखा है,क्या उसका अंत हो जाएगा। अगला लोकसभा का चुनाव गोदी मीडिया बनाम इंडिया मीडिया के बीच होगा।"
- रमेश कुमार "रिपु"
क्या पत्रकारिता के नए युग की शुरूआत होने वाली है। इसलिए इंडिया गठबंधन ने चौदह एंकरों का बाॅयकाॅट करने का फैसला किया है। इंडिया गठबधंधन के बैन करने से क्या देश की राजनीति की दिशा बदल जाएगी? या फिर इलेक्ट्रानिक मीडिया का स्वरूप। इंडिया गठबंधन ने जिस मीडिया को गोदी मीडिया का नाम दे रखा है,क्या उसका अंत हो जाएगा। अगला लोकसभा का चुनाव गोदी मीडिया बनाम इंडिया मीडिया के बीच होगा। ये सवाल नौ साल बाद उठ रहे हैं। जिन एंकरों के कार्यक्रमों में इंडिया गठबंधन ने अपने प्रवक्ताओं को नहीं जाने को कहा है,जाहिर सी बात है इससे न्यूज चैनलों की टीआरपी गिर जाएगी। इस समय जिन न्यूज एंकरों के शो को बाॅयकाॅट किया गया है वो एंकर भारी नाराज हैं। जैसा कि न्यूज एंकर रुबिका लियाकत ने इंडिया गठबंधन के बहिष्कार की लिस्ट में अपना नाम पर होने पर लिखा है, इसे बैन करना नहीं,डरना कहते हैं।
बहिष्कार की वजह..
सवाल यह है कि दिल्ली में शरद पवार के घर पर हुई बैठक के बाद चौदह टी.वी.एंकरो की सूची क्यों बनी जिनके कार्यक्रम में इंडिया गठबंधन के नेताओ के नहीं जाने की बात कही गयी। इंडिया गठबंधन ने चौदह एंकरो का बाॅयकाॅट क्यों किया। जबकि मीडिया की ताकत से हर कोई परिचित है। ऐसा पहली बार हुआ है, जब एक राजनीतिक संगठन ने मीडिया के बाॅयकाॅट का फैसला किया है। एक कहावत है, किसी की राजनीति को मार देना है तो उसका नाम ही न लो। तो क्या यह मान लिया जाए कि टी.वी. शो में जब इंडिया गठबंधन का कोई प्रवक्ता नहीं होगा तो बीजेपी की चर्चा नहीं होगी। कोई सियासी बहस नहीं होगा। नतीजा शाम को जो सियासी बहस का बाजार टी.वी. में दिखता है वो बंद हो जाएगा। यानी चुनाव तक विपक्ष टी.वी.पर नहीं आएगा। इंडिया गठबंधन का ऐसा फैसला लेने के पीछे वजह साफ है। टी.वी डिबेट शो में एंकर बीजेपी प्रवक्ताओं को ज्यादा समय देते हैं। और पूरा समय मोदी सरकार की तारीफ करते हैं। हैरानी वाली बात है कि एंकर स्वयं बीजेपी का प्रवक्ता बन जाते हैं। सवाल कुछ होता है और बीजेपी प्रवक्ता जवाब कुछ देते हैं,लेकिन एंकर उन्हीं का पक्ष लेते है। चित्रा त्रिपाठी,अंजना ओम कश्यप और रूबिया लियाकत अक्सर ऐसा ही करती है। टी.वी.में सार्थक बहस की बजाए सम्प्रदायिक तनाव वाली बातें होती है। जैसा कि कांग्रेस प्रवक्ता पवन खेड़ा ने कहा, हर शाम पाँच बचे कुछ चैनलों पर नफरत का बाजार सज जाता है। पिछले नौ साल से यही चल रहा है। अलग-अलग पार्टियों के कुछ प्रवक्ता इन बाजारों में जाते हैं। कुछ एक्सपर्ट जाते हैं। कुछ विश्लेषक जाते हैं। लेकिन सच तो ये है कि, हम सब वहां उस नफरत बाजार में ग्राहक के तौर पर जाते हैं।
पत्रकारिता बदल गयी..
क्या यह मान लिया जाए कि सन् 2014 के बाद से पत्रकारिता का चेहरा बदल गया है। उसे रतौंधी और दिनौधी हो गयी है। इसलिए इंडिया गठबंधन ने नफरती एंकरों की दुकान का बाॅयकाॅट करने फैसला किया है। गौरतलब है कि 11 मार्च को सुधीर चौधरी के डीएनए प्रोग्राम में एक जिहाद चार्ट दिखाया गया था। जिसमें उन्होंने जिहाद के अलग-.अलग रूप बताए थे। हालाँकि इस शो के बाद सोशल मीडिया समेत कई जगहों पर इस कारण उन पर इस्लामिक कट्टरपंथियों और सेकुलरों ने निशाना साधा और उनके खिलाफ कार्रवाई की माँग की थी। उनके खिलाफ कर्नाटक में गंभीर धाराओं में मामला दर्ज हुआ। हाईकोर्ट ने कहा कि, पहली नजर में सुधीर के खिलाफ मामला बनता है। जांच में सही पाया गया तो कार्रवाई होगी।
नया लोकतंत्र गढ़ा जा रहा..
मीडिया यदि फेक न्यूज के जरिए सत्ता पक्ष की छवि खराब करने की कोशिश करेगा तो उसे लोकतंत्र का निष्पक्ष पाया नहीं माना जा सकता। और यदि मीडिया किसी एक पार्टी के लिए काम करने लगेगा तो बात साफ है कि, वह किसी एक पार्टी को खत्म करने की सुपाड़ी ले रखा है। पूंजी का ऐसा खेल देश में पहली बार देखा जा रहा है। सवाल यह है कि चौदह एंकर ही क्यों,और क्यों नहीं? इंडिया गठबंधन का मानना है कि ये एंकर लोकतंत्र को खत्म करने का काम कर रहे हैं। इससे इंकार नहीं है कि, तमाम चैनलों के भीतर कारपोरेट का पैसा लगा हुआ है। सरकारी विज्ञापनों के लिए वो सरकार का पक्षधर हो गए हैं। एनडीडी टी.वी. अडानी का है और नेटवर्क 18 मुकेश अंबानी का। जाहिर सी बात है कि विपक्ष को मीडिया खत्म करने की जो रणनीति बनाई उसके जाल में फंसने से बचने इंडिया गठबंधन ने चुनाव से पहले एंकर के जरिए टी.वी.चैनल का बाॅयकाॅट किया है। वैसे चैनल के अपने दर्शक हैं। चैनल की अपनी साख है। स्वायता है। उसकी टी.आर.पी.है। उस पर नकेल कैसे लगाया जा सकता है। सत्ता के समानांतर एक लकीर खींचने के लिए इंडिया गठबंधन ने एंकरों के बाॅयकाॅट का फैसला किया। क्यों कि विपक्ष की बात चैनलों के जरिए जनता तक आ नहीं रही थी। इंडिया गठबंधन जनता को यह बताना चाहता है कि, एंकर सत्ता पक्ष के लिए लोकतंत्र गढ़ रहे है। चैनल यह मानते हैं कि वह केन्द्र सरकार के साथ रहेंगे तो उनके खिलाफ भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई नहीं होगी। घपले- घोटाले सामने नहीं आएगा। चैनल वालों का अपना बिजेनेस माॅडल बदल गया है। 2014 के बाद सरकार ने मीडिया पर चार गुना पैसा खर्च करने लगी। इडिया टीवी 638 करोड़,न्यूज सेंशन 177 करोड़ रुपए,टीवी18, 7808 करोड़ रुपए एनडीटीवी का सालाना 140 करोड़ रुपए आय है। अब सरकार ने जिन राज्यों में गैर बीजेपी की सरकार है, वहां इन चैनलों के विज्ञापन में कटौती करने का फैसला किया है। हो सकता है, आने वाले समय में इंडिया गठबंधन और एंकरो की सूची जारी करे। बीजेपी का कहना है कि, इंडिया गठबंधन एक नया लोकतंत्र गढ़ रहा है
पत्रकारिकता के मूल्यों का हनन..
आरोप है कि इन एंकरो के कार्यक्रम में केवल एंकर ही नहीं, कुछ ऐसे लोग बुलाए जाते हैं जो आरएसएस और बीजेपी का समर्थन करते हैं। विपक्ष की खिलाफत करते हैं। ये सिर्फ राजनीतिक पक्षपात की बात नहीं है, ये पत्रकारिता के मूल्यों के उल्लंघन की भी बात है। मीडिया जगत में यह माना जाता है कि, सन् 2014 के बाद पत्रकारिता के मूल्य बदल गए। किसी भी टी.वी एंकर ने अमितशाह, नरेन्द्र मोदी,योगी आदित्यनाथ या फिर राजनाथ से महंगाई,बेरोजगारी,देश की अर्थ व्यवस्था,अच्छे दिन कब आएंगे, मणिपुर और अदानी मुद्दे पर कोई सवाल नहीं किया। सुप्रिया श्रीनेत कहती हैं,सरकार के इशारों पर चलने वाले न्यूजरूम जो पीएमओ के चपरासी के वॉट्सऐप पर चलते हैं,उनके लिए मेरे मन में कोई सम्मान नहीं वो चरण चुंबन का काम करते हैं। इसलिए चरण चुंबक कहलाएंगे। इंडिया गठबंधन के इस फैसले पर बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा ने कहा, न्यूज एंकरों की इस तरह लिस्ट जारी करना नाजियों के काम करने का तरीका है,जिसमें ये तय किया जाता है कि किसको निशाना बनाना है। अब भी इन पार्टियों के अंदर इमरजेंसी के समय की मानसिकता बनी हुई है।"
शीर्ष अदालत ने कहा..
इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की कार्य शैली कटघरे में है, तभी तो प्रधान न्यायाधीश डी.आई.चन्द्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि, पक्षपातपूर्ण रिपोर्टिग से लोगों को संदेह होता है कि आरोपी ने ही अपराध किया है। पीठ ने कहा कि मीडिया की रिपोर्टिग की आरोपी की नीजता का उल्लघंन कर सकती हैं। सुप्रीम कोर्ट ने गृह मंत्रालय से पुलिस के मीडिया ब्रीफिंग को लेकर गाइडलाइंस बनाने के लिए कहा है। जाहिर सी बात है कि शीर्ष अदालत भी मानती है कि,कहीं न कहीं मीडिया भी एक नया लोकतंत्र गढ़ है। जो देशहित में नहीं है।
सियासी हेंगर में लटका नारी शक्ति एक्ट
"मोदी सरकार नारी शक्ति वंदन विधयेक तैयारी करके लाती तो बीजेपी के लिए चुनावी मास्टर स्ट्रोक होता। अब यह विधेयक 2029 तक टल गया। जातिय जनगणना और परिसीमन बगैर महिला आरक्षण बिल केवल चुनावी जुमला है। वहीं रोहणी आयोग की रिपोर्ट से स्पष्ट है कि देश में सैकड़ों जातियों को आरक्षण का लाभ नहीं मिल रहा।"
रमेश कुमार रिपु
.प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी सियासत के बाजीगर है। उन्हें पता है, सियासी बाजार में हलचल के लिए क्या करना चाहिए। और उन्होने वही किया। एक नया मुद्दा उछाल कर देश भर का ध्यान अपनी ओर खींचा। मुद्दे पर विपक्ष किस तरह हमला करेगा और मुद्दा कितने घंटे जिंदा रहेगा,इसकी चिंता नहीं करते। हैरानी वाला सवाल यह है,कि जब देश में जनगणना ही नहीं हुई है,फिर सरकार कैसे कल्याणकारी योजना बना लेती है। इतना ही नहीं, सरकार इसका आकलन कैसे कर लेती है, कि इतने लोगों को योजना का लाभ मिल रहा है। यह एक यक्ष प्रश्न है। प्रश्न तो यह भी है कि मोदी सरकार ने बिना जनगणना,परिसीमन के महिला आरक्षण बिल लोकसभा में पेश कैसे कर दिया। क्या नई संसद भवन में एक सियासी इतिहास की पटकथा रचने के लिए ऐसा किया। जबकि सरकार के पास किस जाति की कितनी महिलाएं हैं,उसका डाटा नहीं है। मोदी ने नारी शक्ति वंदन विधेयक में ओबीसी का जिक्र नहीं किया। जबकि ओबीसी बीजेपी से नाराज है। बीजेपी को सन् 2014 के चुनाव में उच्च पिछड़ी जाति 30 फीसदी और 2019 में 41 फीसदी वोट की थी। निम्न पिछड़ी जाति 2014 में 42 फीसदी और 219 में 48 फीसदी वोट की थी। वहीं अन्य पिछड़ी जाति बीजेपी के साथ 2014 में 34 फीसदी और 2019 में 44 फीसदी वोट की। जाहिर है मोदी ने ओबीसी को नजर अंदाज कर बहुत बड़ी गलती की। और इंडिया गठबंधन ने इसकी वकालत कर सत्ता पक्ष को चोट दे दी। संसद में 85 सांसद ओबीसी हैं। दो दलित कैबिनेट मंत्री हैं। ग्यारह महिला मंत्री हैं। अति पिछड़ी जाति के 19 मंत्री हैं। ओबीसी के पांच कैबिनेट और 29 मंत्री हैं। हर राज्यों में वोट शेयरिंग से पता चलाता है, कि जिधर सत्ता रही ओबीसी उधर गए।
▪️सियासी भूगोल बदला..
देश की गंभीर समस्याओं से विपक्ष और देशवासियों का ध्यान भटकाने के लिए मोदी सरकर ने महिला आरक्षण बिल का झुनझुना लाई है। यह जानते हुए भी कि महिला आरक्षण बिल के रास्ते में परिसीमन और डेलिमिटेशन के रोड़े हैं। यह काम 2024 के आम चुनाव तक संभव नहीं है। एस.सी,एसटी और ओबीसी का कोटा कितना दिया जाए यह भी बगैर जातिय गणना के संभव नहीं है। हर दस साल बाद सियासी भूगोल बदल जाता है। मोदी सरकार नारी शक्ति वंदन विधेयक तैयारी करके लाती तो बीजेपी के लिए चुनावी मास्टर स्ट्रोक होता। अब यह विधेयक 2029 तक टल गया। जातिय जनगणना और परिसीमन बगैर महिला आरक्षण बिल केवल चुनावी जुमला है। वहीं रोहणी आयोग की रिपोर्ट से स्पष्ट है कि देश में सैकड़ों जातियों को आरक्षण का लाभ नहीं मिल रहा।
▪️बीजेपी ने लटकाया बिल..
सन् 2014 और 2019 में बीजेपी ने अपने घोषणापत्रों में महिलाओं को 33 आरक्षण देने का वादा किया था। लेकिन उसे लटकाए रखा। महिला आरक्षण बिल मोदी सरकार ने इसलिए लाया ताकि उसे चुनावी औजार बना सकें। लेकिन विपक्ष ने उसे भोथरा कर दिया। सदन में इससे पहले भी चार दफा महिला आरक्षण बिल लाया गया था। और उसकी भू्रण हत्या हो गयी। वर्ष 2010 में महिला आरक्षण विधेयक राज्यसभा से पास हुआ लेकिन, बात आगे नहीं बढ़ी। उससे पहले विधेयक को 1998,1999, 2002 और 2003 में संसद से पारित कराने के प्रयास हुए थे। 12 सितंबर 1996 को एच.डी देवगौड़ा की सरकार ने 81वें संविधान संशोधन विधेयक के रूप में ससंद में महिला आरक्षण विधेयक को पेश किया था। उस समय यूनाइटेड फ्रंट की सरकार थी,जो 13 पार्टियों का गठबंधन था। लेकिन सरकार में शामिल जनता दल और अन्य कुछेक पार्टियों के नेता महिला आरक्षण के पक्ष में नहीं थे। सियासत में महिलाओं की हिस्सेदारी कैसे बढ़े सदन में और सदन के बाहर बातें होती रही है। लेकिन राजनीति दलों में इच्छा शक्ति की कमी हमेशा देखी गयी। इससे इंकार भी नहीं किया जा सकता, कि सियासी मर्द इसके पक्षधर नहीं हैं,कि राजनीति में महिलाओं की हिस्सेदारी बढ़े। जैसा कि मुलायम सिंह यादव ने कहा था,कि महिलाओं की संख्या सदन में बढ़ जाने पर उन्हें देखकर पुरुष सीटी मारेंगे। सोच बदले तो देश बदले। जाहिर सी बात है,केवल बिल पास हो जाना ही महत्वपूर्ण नहीं है। व्यावारिकि रूप लेता भी दिखना चाहिए। सिफारिशें भी की गयी, कि लोकसभा और विधान सभाओं में महिलाओं के लिए एक तिहाई सीटें आरक्षित कर दी जाएं। इसे लेकर रूप रेखा भी बनी। संसद में उसे कानूनी दर्जा भी दिलाने की कोशिश होती रही हैं। लेकिन अलग- अलग सियासी दलों के विचारो में भिन्नता के चलते बिल मुकम्मल नहीं हो सका। पिछले सत्ताइश सालों से यह विधेयक अधर में था। सन् 2029 के आम चुनाव में यह बिल लागू हुआ तोे सदन में 82 की जगह 181 महिला सांसद दिखेंगी। नारी शक्ति वंदन विधेयक को केवल 15 सालों तक ही लागू रखने का प्रस्ताव है। इसके बाद राजनीति में महिलाओं की भागेदारी सशक्त रहने पर इस कानून की शायद जरूर न पड़े।
▪️विधेयक का विरोध क्यों..
महिला आरक्षण बिल पर केवल सामाजवादी और वामपंथी दलों ने खिलाफत की। उनका कहना था कि पिछड़े तबके की महिलाओं के संदर्भ में इस बिल में कोई स्पष्ट रूप रेखा तय नहीं की गयी है। देवगौड़ा के समय की बात हो या फिर राजीव गांधी के समय भी ऐसा ही था। और अब मोदी सरकार के समय भी इस बिल को लेकर यही सवाल उठा है। नारी शक्ति वंदन विधेयक में भी तैतीस फीसदी आरक्षण की बात की गयी है,लेकिन अलग- अलग जाति की महिलाओं का कोटा कितना होगा लोकसभा और विधान सभा के चुनाव में यह नहीं बताया गया है। आरक्षित सीटों से बाहर भी महिलाएं चुनाव लड़ती आई हैं,उसे कायम रखा गया है। विधयेक में अन्य पिछड़ी जातियों का कोटा निर्धारित नहीं होने से इसका विरोध हो रहा है। मोदी जानते थे,ऐसा होगा। सरकार की मंशा नारी शक्ति विधयेक को केवल उछालना था। इसीलिए उसने जनगणना 2022 में नहीं कराया और न ही परिसीमन।
▪️सोशल इंजीनियरिंग..
नारी शक्ति वंदन विधेयक के जरिए विपक्ष सोशल इंजीनियरिंग की राजनीति करना चाहता है। वहीं सदन में स्मृति इरानी कहती हैं, कि संविधान के मुताबिक धर्म के आधार पर आरक्षण नहीं दिया जा सकता। विपक्ष भ्रमित करने का प्रयास कर रहा है। अब विपक्ष महिला आरक्षण की लड़ाई ओबीसी कोटे तक ले आया है। प्रथम दृष्टया ये बिल आरक्षण देने की नीयत से नहीं लाया गया है। जैसा कि बसपा सुप्रीमों कहती हैं,कि महिला आरक्षण बिल तुरंत लागू नहीं किया जा सकता। यह बिल सन् 2029 से पहले तभी संभव है,जब एससी,एसटी और ओबीसी बड़ा दिल दिखाएं। वो 2024 के चुनाव में आरक्षण मिलने की वकालत न करें। यदि ऐसा हुआ तो फिर इसकी कोई गारंटी नहीं है, कि अगली सरकार तैंतीस फीसदी आरक्षण पर पुर्नविचार करे। चूंकि देश में ओबीसी जाति के वोटर बहुत हैं। इसलिए हर सियासी दल चाहता है कि ओबीसी को आरक्षण मिले।
▪️सियासी हेंगर में नारी शक्ति..
सवाल यह है कि नारी शक्ति वंदन विधेयक कैसे लागू होगा? संसद के दोनों सदनों में पास कराना होगा। आधे राज्यों की विधान सभा में पास हो। रोहणी आयोग की रिपोर्ट कहती है,38 जातियों का दूसरे पर एक चौथायी कब्जा है। सिर्फ 10 फीसदी जातियों को आरक्षण का लाभ दस फीसदी मिला हुआ है। 983 जातियों को आरक्षण का कोई लाभ नहीं मिला। 994 जातियों को महज 2.68 फीसदी आरक्षण मिला है। देश की 506 ऐसी जातियां है, जिन्हें करीब 22 फीसदी लाभ मिला। सियासी नजरिए से महिला आरक्षण से महिला सशक्तिकरण होगा, इसकी कल्पना बेमानी है। महिलाएं खुश हो सकती हैं,कि नए बिल से उन्हें समानता का अधिकार मिलेगा। जबकि अभी सियासी हेंगर में नारी शक्ति बिल लटका हुआ है।
Friday, September 8, 2023
एम.पी में बीजेपी का ढोल फट रहा
एम.पी में बीजेपी का ढोल फट रहा
कांग्रेस के सर्वे में बीजेपी 85 सीटो में सिमटी
रमेश कुमार ‘रिपु’
मध्यप्रदेश में बीजेपी का ढोल फट रहा है। यह कांग्रेस का सर्वे बता रहा है। कांग्रेस ने तीन टीमों से सर्वे कराया। दक्षिण भारत,यूपी और मध्यप्रदेश की टीम के जरिए। सर्वे बता रहे हैं कि लाड़ली बहना की वजह से बीजेपी के खाते में पांच फीसदी वोटों में इजाफा हुआ है। इस वजह से बीजेपी की सीट बढ़कर 80 से 85 तक हो गयी है। अभी चुनाव होने में दो माह का वक्त है। बीजेपी कितना कवर करती है मोदी भी नहीं जानते। कांग्रेस के सर्वे को सच मान लिया जाए तो बीजेपी के ढोल फटने की वजह कई है।
मुख्यमंत्री शिवराज सिह चैहान इतना परेशान कभी किसी सी चुनाव में नहीं हुए। जितना इस बार के विधान सभा चुनाव को लेकर है। उसकी वजह कई हैं। बीजेपी एंटी इन्कम्बैसी के दौर से गुजर रही है। यह एंटी इन्कम्बैसी की वजह मोदी हैं। महंगाई,बेरोजगारी और झूठे वायदे के लिए केद्र सरकार जिम्मेदार है। वहीं प्रदेश में भ्रष्टाचार के लिए शिवराज सिंह। प्रदेश में 18 साल के कार्यकाल में शिवराज के समय 230 घोटाले हुए हैं। शिवराज पहले मुख्यमंत्री है,जिनके खिलाफ मोदी ने व्यापम घोटाले के लिए सीबीआई जांच का आदेश दिया। शिवराज घोंषणा का रिकार्ड बना दिये हैं। अपने कार्यकाल में अब तक तीस हजार से अधिक घोंषणाएं कर चुके हैं। विपक्ष उन्हें घोंषणावीर कहता है।
मोदी को चुनावी दूल्हा बनने परहेज
आर एस एस पहले ही कह चुका है कि मोदी चुनावी चेहरा इस बार नहीं हैं। संघ मानता है कि न तो मोदी चेहरा काम आ रहा है और न ही हिन्दुत्व कार्ड। हिमाचल प्रदेश और कर्नाटक चुनाव हारने के बाद मोदी बैकफुट में आ गए हैं। मोदी ही जब बीजेपी हैं। मोदी हैं तो संघ है। जैसा प्रचारित किया जा रहा है तो फिर दो राज्यों की हार की भी जिम्मेदारी मोदी को लेनी चाहिए। मोदी इसके लिए तैयार नहीं है। वे चुनावी दूल्हा बनना नहीं चाहते। और शिवराज चुनावी घोड़ी से उतरना चाहते हैं। इस बार जनदर्शन यात्रा में शिवराज को पार्टी ने प्रमोट नहीं किया है। इसीलिए चित्रकूट में जेपी नड्डा ने जनदर्शन आर्शीवाद यात्रा को हरी झंडी दिखाई। सीधी कांड से आदिवासियों को साधने के लिए ऐसा किया गया है। विंध्य क्षेत्र की 30 सीटों में 23 सीटें ऐसी है जहां ब्राम्हणों की आबादी 30 फीसदी से ज्यादा है। सीधी पेशाब कांड में प्रवेश शुक्ला के घर बुलडोजर चला देने से ब्राम्हण समाज बीजेपी के खिलाफ हो गया है। सन् 2018 के चुनाव में बीजेपी आदिवासी बाहुल इलाके के 84 सीटों में 34 ही जीत पाई थी। जबकि 2013 के चुनाव में 59 सीट जीती थी। अब आदिवासियों का विश्वास जीतने में बीजेपी लगी है। मध्यप्रदेश देश में पहले नम्बर पर है जहां आदिवासियो ंके खिलाफ 2627 मामले दर्ज हुए हैं। दलितों के मामले में तीसरे स्थान पर है,7214 मामले दर्ज हुए हैं। रेप मामले में दूसरे स्थान पर है,कुल 2947 मामले दर्ज हुए हैं। यह स्थिति 2022 की है। एनसीआर की रिपेार्ट के मुताबिक 2021 में 17008 बच्चे क्राइम के शिकार हुए थे।
शिवराज विरूद्ध बीजेपी
सन् 2014 में पी.एम.की दौड़ में शिवराज और डाॅ रमन सिंह थे। मोदी और अमितशाह की जोड़ी ने दोनों को किनारे कर दिया। छत्तीसगढ़ में रमन कुछ नहीं कर पाए। सिंधिया के चलते मध्यप्रदेश में बीजेपी ने सरकार बना ली। मुख्यमंत्री शिवराज बन गए लेकिन इनके चारो ओर इनके विरोधी खड़े हो गए। यह सब मोदी की रणनीति के तहत हुआ। वी.डी शर्मा,नरोत्तम मिश्रा,ज्योतिरादित्य सिंधिया,और कैलाश विजयवर्गीय। ये सभी मुख्यमंत्री बनना चाहते हैं। कैलाश विजयवर्गीय ने तो खुलकर कह दिया था कि मुझे मुख्यमंत्री बनाया जाए। वी.डी शर्मा मुख्यमंत्री बनने जा रहे हैं, सोशल मीडिया में खबरे खूब वायरल हुई थी। जाहिर सी बात है कि बीजेपी में जबरदस्त की गुंटबंदी है। शिवराज की अमितशाह से जम नहीं रही है। आत्मविश्वास डगमगाया है। और प्रदेश में भ्रष्टाचार चरम पर है।
अमितशाह हावी हैं
इस बार भारी एंटी इन्कमबैसी की वजह से बीजेपी हाईकमान भी मान कर चल रहा है कि मध्यप्रदेश में भगवा छतरी तनने में दुविधा है। वहीं अमितशाह का दावा है कि जनआर्शीवाद यात्रा जब समाप्त होगी, तब बीेजेपी 150 सीट जीतेगी। जबकि बीजेपी अपने अच्छे दिनों में भी इतनी सीट नहीं जीती थी। हो सकता है कि बीजेपी के कई प्रत्याशी पांच-सात सौ वाटों से जीतें। कलेक्टर कुछ भी कर सकते हैं। इसी आशंका को देखते हुए दिग्विजय सिंह ने मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी अनुपम राजन को एक पत्र देकर कहा कि जहां भी हार जीत का फैसला एक हजार वोटो के अंदर हो वहां पुर्न मतगणना कराया जाए। प्रदेश के मुख्य सचिव इकबाल बैस दो बार सेवा वृद्धि ले चुके हैं। उनके नेतृत्व में निष्पक्ष चुनाव की उम्मीद कम है। इसलिए उनकी सेवाएं खत्म की जाए।
बीजेपी में भगदड़
बीजेपी के नेता और विधायक कांग्रेस में जा रहे हैं। भाजपा के 31 बडे नेता अब तक कांग्रेस में जा चुके हैं। इसमें से 25 फीसदी सिंधिया गुट के हैं। वीरेन्द्र रघुवंशी,भ्ंावर सिंह शेखावत,गिरिजाशंकर,माखन सिंह सोलंकी,राधेलाल बघेल,दीपक जोशी पूर्व मुख्यमंत्री कैलाश जोशी के पुत्र हैं,देशराज सिंह,हेमंत लहरिया,कमल पटेल के राइट हैंड दीपक सारण,धु्रव प्रताप सिंह,अवधेश नायक,रोशनी यादव,समंदर पटेल,बैजनाथ सिंह यादव,रघुराज धाकड़, राकेश गुप्ता, गगन दीक्षित,यदुराज सिंह यादव आदि लोगों ने बीजेपी छोड़ दी। वजह बताते हैं,पार्टी अपने मूल सिद्धतों को भूल गयी। भ्रष्टाचार और गुटबाजी हावी है। भाजपा तानाशाही की सरकार चलाती है। सिंधिया समर्थकों का दबदबा बढ़ गया है। चुनाव नजदीक आते ही ज्यादातर बीजेपी के नेता पार्टी छोड़ रहे है। जाहिर सी बात है कि कांग्रेस के सर्वे पर बीजेपी नेता भी भरोसा कर रहे हैं कि शिवराज अब खत्म होने जा रहा है।
Wednesday, July 19, 2023
पुष्पराज तुरुप कितना कारगर...
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0 रमेश कुमार 'रिपु"
रियासत नहीं रही। मगर,बघेली जनता के लिए अब भी पुष्पराज सिंह महाराज हैं। वैसे लोकतंत्र में जनता ही महाराज है।वहीं रंग बदलती सियासत के दौर में भी सुर्खियों में रहने की सियासत करने में पुष्पराज सिंह माहिर हैं। कांग्रेस में थे तब भी और नहीं थे,तब भी। पुष्पराज सिंह एक बार फिर भाजपा में आ गए हैँ । कांग्रेस के कईयों को लगता है कि वे सेमरिया या फिर गुढ़ विधान सभा से चुनाव लडेंगें। जबकि ऐसा नहीं है। बीजेपी ने बहुत सोच समझ कर पुष्पराज सिंह को प्रोडेक्ट कर रही है। पुष्पराज सिंह पर इस बार जिम्मा है बीजेपी को आठों विधान सभा की सीट दिलाना। बीजेपी उनका पूरा राजनीतिक फायदा उठाना चाहती है। बीजेपी के लिए और उनके लिए भी, यह एक सुनहरा मौका है।
सुनहरी कामयाबी का जिम्मा.
सन् 2023 के विधान सभा चुनाव में पुष्पराज सिंह के सक्रिय होने से चुनाव बेहद रोचक हो जाएगा। वहीं बीजेपी एंटीइन्कम्बैसी से गुजर रही है। रीवा की आठों विधान सभा के लिए पुष्पराज सिंह पर बीजेपी दांव खेलने जा रही है। सवाल यह है कि बीजेपी को बढ़त मिलेगी या फिर भगवा छतरी कम जगह ही तन पाएगी। बीजेपी के लिए पुष्पराज सिंह कितना तुरुप कारगर होगें,इस पर आकलन कांग्रेस में होने लगा हैं। बीजेपी की रणनीति के मुताबिक पुष्पराज सिंह आठों विधान सभा में बीजेपी के लिए वोट मांगेंगे। सीटों के संभावित नुकसान को यदि पुष्पराज सिंह कम करने में कामयाब हो गए,तो लोकसभा की टिकट उनकी तय है। विधान सभा चुनाव के परिणाम ही बताएंगे कि पुष्पराज सिंह कितने कामयाब सियासी खिलाड़ी हैं। रीवा जिला महाराजमय होता है या फिर कमलनाथमय,यह हर कोई देखना चाहता है।
कैसा और कहां होगा असर..
रिमही जनता आज भी पुष्पराज सिंह को महाराज कहती है। ग्रामीण क्षेत्रों में उनकी पकड़, सियासी उम्मीद से ज्यादा है। पुष्पराज सिंह को न तो नागेन्द्र सिंह,न ही राजेन्द्र शुक्ला और न ही जनार्दन मिश्रा नकार सकते हैं। शिवराज सिंह चौहान को भी पता है कि रीवा में कोई कार्ड चल सकता है तो वो है पुष्पराज सिंह। उनके खुलकर बीजेपी के लिए वोट मांगने से भगवा राजनीति का तापमान बढ सकता है। उनकी हाजिर जवाबी,सभी जाति के वोटरों से सीधा जुड़ाव, और कांग्रेस का हर नेता उनके कद की इज्जत करता है। चूंकि कांग्रेस में मंत्री रहे हैं,कांग्रेस की राजनीति की है। ऐसे में कांग्रेस के पाले से अल्पसंख्यक ओबीसी,एससी,एसटी वोटर को खींचना होगा। अल्पसंख्यक वोटर रीवा में करीब 25 हजार है। इन वोटरों के बीच उनका आकर्षण है। युवाओं और महिलाओं के बीच उनकी अपनी लोकप्रियता है।
पुष्पराज का गणराज्य..
पुष्पराज को बीजेपी विधान सभा चुनाव नहीं लड़ाएगी। ऐसे में उनका विरोध किसी भी विधान सभा में नहीं होगा। पुष्पराज सिंह को रीवा जिले की जनता के लिए नया एजेंडा तय करना होगा। साथ ही विराट सोच के साथ, सियासी पिच पर उतरना होगा। सवाल यह है कि जिला ग्रामीण कांग्रेस अध्यक्ष राजेन्द्र शर्मा और शहर कांग्रेस अध्यक्ष लखनलाल खंडेलवाला क्या पुष्पराज सिंह के किसी बयान का विरोध करेंगे? क्यों कि दोनों का इनसे साहब सलाम का सियासी रिश्ता बरसों से है। राजेन्द्र शर्मा क्या श्रीयुत श्रीनिवास तिवारी की भूमिका में पुष्पराज के सामने आ सकेंगे? राजेन्द्र शुक्ला को घेरने के लिए कांग्रेस के पास बहुत सारी बातें हैं। लेकिन पुष्पराज सिंह के खिलाफ बोलने के लिए कुछ भी नहीं है। बीजेपी का हो या फिर कांग्रेस का अथवा बसपा का कोई भी नेता महाराज के बायें चलने की सियासत कम से कम सामने से करने की हिम्मत नहीं करता। क्या इतने भर से पुष्पराज सिंह भगवा छतरी रीवा की आठों विधान सभा में तान लेंगे? ंइजीनियर राजेन्द्र शर्मा कहते हैं,कांग्रेस चार सीट सीधे -सीधे जीत रही है। लेकिन जनता में बदलाव का जो जोश देखने को मिल रहा है उससे कह सकते हैं कि आठों सीट कांग्रेस के हाथ में होगी। गौरतलब है सुन्दर लाल तिवारी ने 2018 के चुनाव में कहा था,कि हम सात सीट जीतेंगे। अमहिया काग्रेस ने जो राजनीति 2018 में की थी,यदि वही की, तो पुष्पराज सिंह का सियासी कद 2023 के चुनाव में बढ़कर मोदी और अमितशाह के साथ खड़े होने की हो जाएगी।
दो ठाकुर आमने- सामने होंगे..
विंध्य में कुंवर अर्जुन सिंह को जो सम्मान मिलता था,उनके चलते अजय सिंह राहुल को भी मिलता है। पुष्पराज सिंह बीजेपी के लिए ठाकुरों से वोट मांगेगे और अजय सिंह राहुल कांग्रेस के लिए। ठाकुर राजनीति का टकराव सिर्फ रीवा ही नहीं, पूरे रीवा संभाग की सीटों पर असर डालेगी। अजय सिंह राहुल मोदी और शिवराज के वादे और भ्रष्टाचार का लेखा- जोखा रखेंगे तो पुष्पराज सिंह मोदी के कामकाज की बातें करेंगे। लाड़ली बहना और संविदा कर्मियों के अलावा शिवराज सरकार की योजनाओं की बातें करेंगे, मोदी को ईमानदार और मेहनती होने की बात करेंगे। लेकिन पुष्पराज सिंह को इसका भी जवाब देना होगा कि अल्पसंख्यक बीजेपी के दौर में अपने आप को डरा महसूस क्यों कर रहा है?
मैराथन मैन..
सवाल यह है कि पुष्पराज सिंह मैराथन मैन बन पाएंगे या फिर भगवा तिलक और गमछा लेकर घूमते रह जाएंगे। जिले की राजनीति से पुष्पराज सिंह पन्द्रह सालों से कटे हुए हैं। नया वोटर उन्हें पहचानता भी नहीं। युवा लड़के और लड़कियों के बीच उनका अपना कोई जनाधार नहीं है। वो प्रियंका,राहुल गांधी और मोदी को जानता है। उनके पास ऐसा क्या है, जो नयी सदी के युवाओं को रिझा सकें। उन्हें मना सकें कि बीजेपी को वोट देना ही हितकर है। नई नस्ल की वोट की फसल को काटने के लिए रीवा जिले के लिए क्या अलग से घोषणा पत्र लेकर उनके पास पहुंचेंगे। जबकि कई कांग्रेसी पुष्पराज सिंह को किचन सियासी कहते हैं। पुष्पराज सिंह महाराज छवि से बाहर कितना निकल पाएंगे,शायद वो खुद भी नहीं जानते। उनके साथ कई ऐसे विवाद भी हैं। जिन्हें बीजेपी ने कभी खोला था चुनाव में। वही विवाद कांग्रेस ने खोला तो पुष्पराज सिंह के लिए संकट खड़ा हो जाएगा।
बहरहाल पुष्पराज सिंह अपनी सियासत की नई पारी एक बार फिर से बीजेपी में खेलने जा रहे हैं। सच तो यह है कि बीजेपी के लिए और उनके लिए भी, यह एक मौका है।
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